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Showing posts from November, 2019
हम मर रहे हैं हमारा समाज मर रहा है 'सभ्य' शब्द अस्तित्व से जूझ रहा है "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता" जैसे आप्त वचनों पर कालिख़ पुती जा रही है "मातृवत् परदारेषु" जैसे महद् कथनों पर थूका जा रहा है हम मानव से पत्थर बन रहे हैं हम चेतन से जड़ की ओर लौट रहे हैं यह व्यतिक्रम हमारी बुद्धि का पलायन नहीं है मात्र यह हमारी आत्मा की मृत्यु की घोषणा है ! बलात्कार खुलेआम दिन-दहाड़े भेड़ियों की टोली नोच रही हैं मातृत्व का आँचल ये नराधम अपनी कलुषित साँसें बलात् घुसेड़ रहे हैं उस महिला के मुंह में जिसने इस संसार तक को साँसें सौंपी हैं ! ये हैवान, राक्षस मानव खाल में क्यों समझते नहीं एक छोटी बात कि उनके अपने घर में भी होगी माँ-बहन-बेटी ! पर हमें कहाँ कोई फ़र्क़ पड़ रहा ? अब हमें ये ख़बरें उद्वेलित नहीं करतीं हमारा विवेक कांग्रेस-बीजेपी की चौखट पर गिरवी पड़ा है हमारी बुद्धि को मीडिया द्वारा रोज़ दिखाये जा रहे चुनावी विश्लेषणों, एक्जिट पोल्स ने हर लिया है अख़बारों ने हमारी आँखों का पानी विषैला कर दिया है हमारे भीतर का राम नारों में बदल गया है ! म...
वो ज़मीं है  उसने थाम रखा है मेरा आसमान  मेरे सितारों से चमकता है उसका सुनहरा आँचल ! वो मेरे साथ चलती है परछाई की तरह मैं उसकी बातों में घुलता हूँ जैसे घुलती है चाय में शक्कर ! वो चूमती है पागल की तरह मुझे एक बच्चा समझकर  और मैं उसे बाहों में भर लेता हूँ ! उसका होना मुझे पूरा करता है  भरता है मेरी भावनाओं के रीते घट ! मैं बेपरवाह सा  उसकी गोद में लेट जाता हूँ  सुस्ताता हूँ, अलसाता हूँ  वो मेरे बालों से खेलती है  एक-एक बाल को अलग अलग करती है वो मेरे माथे पर आये बाल हटाती है और गोरी ललाट पर रख देती है अपने कोमल होंठ  मैं सिमट लेता हूँ खुद को खुद में  वो मुझे खोलती है खिड़की सा ! वो फूल की पंखुड़ी सी  छूकर रसमय कर देती है मुझे  मैंने उसको गले पर कई कई बार चूमा है. उसकी आँखें बोलतीं हैं  और मेरी कलम ! वो मेरी आँखों में झिलमिलाती है सपना बनकर वो वर्तमान को जीते जीते जब भविष्य को भाँपती है  तो एकाएक कुछ सोचने के लिए रुक जाती है  मैं उसे भविष्य लगने लगता हूँ कई बार ! वो लड़की है, मैं लड़का हूँ ...
वो लड़की मेरी आँखों में आती है एक सुनहरा सपना बनकर उसके होठों पर तैरतीं हैं कई मुस्कान-लहरें । वो हंसती है जैसे कई फूल शाख से टूटकर किसी उजली चादर पर गिर जाएं. वो चलती है हिरनी सी गाती है कोयल सी चमकती है सितारों सी बजती है सितार सी और बतियाती है अधिकार से मेरी माँ की तरह, बड़ी बहन की तरह वो मुझे सम्भालती है एक छोटे बच्चे की तरह ! उसकी बातों में चुम्बक है वो मुझे अपनी ओर खींचती है. उसकी बातों में खारे पानी के लवण हैं जितना पीऊं, प्यास उतनी ही बढ़ती जाए. उसकी भीगीं लटों में टँग रहे हैं ख़्वाब कई सारे. लता जैसी उसकी कोमल बाहें वो समेट ले जिसे अपने भीतर उसे अपनी खुश्बू से अधमरा कर दे. मैं उसके चैट पर आने का इंतज़ार करता हूँ जैसे छोटा बच्चा स्कूल में छुट्टी की घण्टी बजने का इंतज़ार करता है. जैसे गृहिणी सुबह दूधवाले का इंतज़ार करती है. उसका तिल, मेरा दिल उसके गाल, मेरे सुर-ताल !! तुम्हारा स्वागत प्रिय यह वीरान दिल का भवन आपकी प्रतीक्षा में जाने कब से है. ◆ प्रवीण मकवाणा 

हे लड़की ! अप्सरा सा सौंदर्य तुम्हारा

तुम लड़की हो या अप्सरा कोई ..... तुम्हारी काया की चिक्कण रति रूप को लज्जित करे..तुम्हारा कायिक रचाव अन्यतम, भुवन-भास्वर भी नत हो जाए....गात का अनुपम संघात, एक चित्ताकर्षक दैवीय अनुष्ठान... तुम तीनों रूपों में प्रिय हो मुझे... नारी, महिला और स्त्री ! प्रथम दो में असीम आदर है, सनातन निष्ठा है..मुझे तो तुम्हारा तीसरा रूप रुचता है - स्त्री ! स्त्री में ‘स्त्यै’ है. अर्थात् लज्जा से सिकुड़ना. सूत्र कहता है- ‘लज्जार्थस्य लज्जन्तेपि हि ता:’ ....सलज्ज सौंदर्य ! स्त्री - स्तन केशवती स्त्री ! पाणिनि ऐसा कहते हैं. तुम सद्यस्नाता जैसे पावस ऋतु की बदली.. जो स्पर्श मात्र से तरलायित हो जाए. छूने भर से बिखर जाने की सम्भावना... कितना कोमलांग-वैभव ! कुंतल-राशि ...विटप-वल्लरी सी. अश्वत्थ जैसी शीतल छाँव... मेरी श्रद्धा, मेरा अन्तस् आश्रय-स्थल. नयन ... राजस्थानी-लोक जिसे मिरगानैणी कहता है. पलकों का अवगुंठन और पुतलियों का चञ्चला नर्तन...लास्यमयी लोचन-संसार.. तीक्ष्ण दृष्टि...सीधे उर-भेदन की क्षमता. नासिका कीर सी... दाड़िम सी दंत-पंक्ति ..क्षीण-कटि पर दंतक्षतों की नीलकुसुम-माला कभी जो अंकित हो ...