जोगी का प्रेम-परस
भस्म में रमी सिद्धिनी उतर आयी मसान साधना से वह मंत्र मानिनी एकटक देखती जाती कि निर्जन वन में कौन यह जोगी ? गेरुआ आवेष्टिता देह, कुंडल सुशोभित कर्ण उन्नत ललाट और विस्तीर्ण जटा हृदय की दुर्बलताएँ पहले आंखों में जन्मतीं हैं जब प्रेम-परस से टूटी अवधूत की समाधि, समक्ष प्रस्तुत थी प्रणय-याचना सूत कातने का निवेदन नहीं सुहाया रास नहीं आयीं दैहिक लालचाएँ वज्रमन में घर क्योंकर करतीं वासना की पहनियाँ ? सिद्धिनी ने तब पहली बार यह जाना कि कुंडलिनी से अधिक दुष्कर है प्रेम जगाना .... यह इतिहासों में लिखा सच है कि उस दिन प्रेम हारा और जीता जोग लेकिन अगले दिन एक अचरज हुआ शम्भू रोट चढ़ाने के बाद गोरख ने कुंड में विसर्जित कर दीं ताम्रपत्रों पर खुदी घोषणाएं जिनमें लिखा था कि "गोरख कभी गर्त में नहीं गिरते" कभी-कभी प्रेम पूरे पेड़ को नहीं हिला सकता तब भी उसकी एक पत्ती में विचलन पैदा कर जाता है ◆ प्रवीण मकवाणा