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Showing posts from January, 2020

वामियों का दोगलापन

किस आधार पर कह दिया गोपाल संघी है...? मुझे ज़रा उसकी बस्ती और शाखा की जानकारी दीजिये तो ..... तुम्हारे पास नहीं है. तुम गोड़से को भी संघी कहते रहे... तुम्हारे माई-बाप राहुल जी उसके लिए माफ़ी भी मांग चुके ..वो भी कोर्ट में. शरजिल तुम्हारा भाई है और अफज़ल तुम्हारा बाप. देश तोड़ने की बात करने वाला हर आदमी तुम्हारे खानदान का हिस्सा है. मैं गोपाल के किये का समर्थन नहीं करता... किसी को नहीं करना चाहिए. किसी को कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जानी चाहिए.... लेकिन वामियों और मुल्लों का दोगलापन देखिये. सीएए का विरोध करते एक मुल्ले के हाथ में बम फटा था... वो कौन था ? देश का रक्षक ? नहीं.. वह तुम्हारा अल्पसंख्यक भाई था. कश्मीर में पत्थर फेंकने वाले भटके हुए नौजवान... क्योंकि वो सब अल्लाह-परस्त हैं. चूँकि वे मुसलमान हैं तो तुम्हारे ख़ास हुए... जैसे शादी में जीजाजी-फूफाजी. रवीश की बकलोली तो अलग ही है... फलाँ के माँ-बाप गरीब हैं. बच्चा पीएचडी कर रहा है. अधिकार के लिए लड़ रहा है. ...कायके अधिकार ? भारत तोड़ने के. गोपाल को ढाल बनाकर अपना एजेंडा सफल करना है तुम्हें... सम्भव नहीं है कॉमरेड. ...

महाप्राण का आत्मजा-अनुराग

पुत्री, प्रकृति का अनुपम उपहार .... पिता के अन्तस् की चित्रमयी अभिव्यक्ति ... जिसका पतिगृह जाना भी वज्र-हृदय पिघला दे फिर सरोज तो देवलोकवासिनी हो गयी थी... उसकी निष्प्राण देह देख महाप्राण कवि की चेतना जड़ हो गयी. उसकी चीत्कार सुन स्वयं नभमंडल रोने लगा. रूदन जब कविता में उतरा तो विश्व का विश्रुत शोक गीत बन पड़ा. जिसे पढ़कर कइयों ने अश्रुजल से अपने प्रिय का तर्पण किया, कइयों ने स्वयं को ढांढस बंधाया. " सरोज-स्मृति " में निराला का सम्पूर्ण संवेदनसिक्त हृदय खुल आया है... यहाँ भावनाओं के तटबन्ध टूटे..स्मृतियों के धारे निकल पड़े... आँखों में एक छवि विशेष की आभा आलोक भरती रही, भुजाएं उसे आलिंगन में भरने के लिए कसमसाने लगीं... कवि, पुत्री जन्म पर अबोध से बोध पाता है... "अशब्द अधरों का सुना भाष, मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर ज्योतिस्तरणा के चरणों पर। " लेकिन उस शाश्वत प्रेरणा का छोड़ जाना कवि को भीतर से झकझोर देता है. "जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार -- "जब पिता करेंगे मार्ग पार यह,अक्षम...