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विसर्जन _______________ जोगिन ! निदाघ छूटता जा रहा; आषाढ़ के धवल पखवाड़े में  पावस का प्रथम स्पर्श पाने को उत्कंठित धरा  मघा नगतर के साथ घुल रही  रीतने की अनगिन व्यथा। तुम कहाँ हो ? 
कोसी के तट पर उघाड़े बदन। कुणाल के केशों से निसर रहे जलकण, उसकी आँखों से होकर छाती पर से फिसल रहे थे।  ब्रह्ममुहूर्त में खुली तिस्सरक्खा की नींद  वह कामातुर हो, एकटक कुणाल के स्वनामधन्य नेत्र निहारती। मति की गति को अवरुद्ध करता रोम-रोम में समाया रोमांच।  मखमली चादर मुट्ठी में भर लेती, इतनी उद्यत वह।  हड्डियां बजने लगतीं, शिराओं में रक्त नहीं क्षिप्र दौड़ती वासना। नासिका नाग सदृश फुफकारती; स्वयं ही सहलाने लगती शीर्ण गात।  उपदान से रगड़ती उरोज। नितंबों में नाखून गड़ाती;  आपादमस्तक धधकती वह उल्कापिंड सी।  पुलक की पगथलियों के नीचे दबा अग्रमहिषी का महात्म्य। माँ की ममता नहीं, कुणालकलित हृदय में विकलता के शूल चुभते जाते। प्रणय को काम्य सन्निधि; वय का अंतर मात्र आँकड़ा है।