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Showing posts from October, 2019

सप्तपदी कविताएँ

सप्तपदी 1. इस दीवाली पर  मैंने अपनी मुहब्बत के नाम का एक दीया जलाया दीया बुझ गया  मैं समझ गया कि  अतीत में आलोक भरने से  वर्तमान प्रकाशित नहीं होता ! 2. रामा-श्यामा के दिन  मैं भीड़ बीच अकेला खड़ा था  दूसरे कोने से कोई आवाज़ देगा, बस इसी प्रतीक्षा में ! 3. रंगोली में एक रंग न होने से  कुछ खालीपन सा था  मैं रो दिया आँसू ने वो जगह भर दी ! 4. देहरी पर दीप  जगमगाये  बस नहीं जगमगाया तो  कोई चेहरा ! 5. सात धान में छुपा सौभाग्य  सिर्फ़ तुम्हारा था  यह अब सरासर अतिक्रमण है, अतिक्रमण है ! 6. धन नहीं है, मन नहीं है  लेकिन धड़कन है  मैं कुछ होने का मातम मना रहा हूँ ! 7.  आतिशबाजी में भी  कुछ आवाज़ें दबायी न जा सकीं  वे माचिस की तीली से आतीं रहीं ! ◆ प्रवीण मकवाणा

मेरी डायरी "आकांक्षा " से .....

मेरी डायरी से "त्वरा" कभी कहीं पढ़ा था कि सबसे दुखद क्षण वह होता है जब कोई हमें गले पर चूम रहा हो और हमारे मस्तिष्क में किसी और की स्मृति तैर रही हो! यह कथन उस दिन मेरी अनुभूति हुआ जा रहा था और मैं बेबस असहाय हुआ सब देख रहा था। तन और आत्मा का यह संघर्षपूर्ण द्वंद मुझे भीतर से खोखला कर रहा था। आज से पूर्व मैंने ऐसा अनुभूत नहीं किया था।  दुनिया की संरचना अजीब है, यहाँ कब कोई किसे बचाने आता है ? मैं प्रतिपल हत हुआ जा रहा था।  मेरी चेतना में चञ्चलता उस समय आई होती तो मैं भाग जाता।  उस वक्त में मौत मांग रहा था लेकिन मयस्सर ना हुई। गर्म सांसों की आवाजाही मेरी आत्मा पर कालुष्य-पेषण कर रही थी।  अनचाही बाहों में जकड़े रहने का दर्द आंखों से आंसू बनकर बह नहीं पाया, बस यह कसर रह गई थी।  कमरे का घुप्प अंधियारा और एक विपरीत लिंगी का सामीप्य, किसी के लिए आमंत्रण हो सकता था मेरे लिए असहज-असह्य स्थिति थी। हम दोनों अपनी अपनी जगह सही थे। एक को कुलांगना होना था और दूसरे को "रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई" की तर्ज पर कुल के आदर्शों की पालना करनी थी।  म...

कविता

" वैदेही की खोज में ......" विकीर्ण केश-राशि, श्मश्रु भी बढ़ आयी है वक्षःस्थल तक रविमणि सम चक्षु-द्वय बन गयीं हैं चिंताओं का सलिलाशय श्लथ बाहुवल्ली, पाणि-पल्लवों में भी उतर आया है नैराश्य-भाव कांतिहीन आनन निज झुर्रियों से ढो रहा है अगणित आशंकाएं कर्णाभूषण धोते अपना तन स्वेद-सीकरों से निरन्तर कटिदेश क्लांत अति पाता है संबल कर, तरुवर का बार-बार उपानहों का अपमान करते चरण निस्तेज, जड़ हुए निर्वात ने घेरा सांसों को कुम्हला गयीं शिराएं धमनियों का रक्त गतिभंग हुआ मेधा मर गयी, चेतना पलायन कर गयी विजयदुन्दुभि मौन, रुका जयी अश्वों का दल लक्ष्मण से संवाद शून्य हुआ चिर-रव धर्म-कर्म का प्रश्न किये खग से, मृग से मधुकर श्रेनी से यहाँ तक कि प्रस्तरों से भी तुम्हारे आत्म का अन्वेषण था सीता को ढूंढने जाना विश्वास अटल, प्रबल आस कि प्रणय की पुकार से लोहा तक गलता है अपना आकार बदलता है मूक जन वाणी पाते हैं पंगु दौड़ लगाते हैं मूर्च्छा को मिलता है मंत्र जीने का शिव को साहस विष पीने का ! क्वणन आत्म-नूपुर का सुन, ईप्साएं नर्तन करतीं थीं मैत्री मन की कुटिया त...

कविता - तुम्हारे काँधे पर का तिल

तुम्हारे काँधे पर का तिल तुम्हारे काँधे पर का तिल जैसे निरभ्र नभ में चाँद का दिख जाना ! जैसे दाड़िम का एक दाना रखा हो थाली के मध्य में ! जैसे हिमाच्छादित अद्रि के उत्तुंग शिखर पर बैठी हो कोई गौरेया ! जैसे सुकुमार के कपोल पर लगा दिया हो दिठौना उसकी माँ ने ! जैसे संगमरमर के आँगन बीच उग आया हो कोई गुलाब ! जैसे अक्षि के भीतर की टिमटिमाती,अठखेलियां करती पुतली ! जैसे पुस्तक के धवल पृष्ठ पर लिखा हुआ कालिदास का श्लोक ! जैसे अशोक का अभिलेख खुदा हो किसी प्रस्तर पर ! जैसे बहती हुई सरिता के साथ बहता जाता तृण तरुवर का ! जैसे दूरस्थ क्षितिज में झिलमिलाये बादल का कोई टुकड़ा ! मैं तुम्हारी आत्मा तक कई बार काया के मार्ग से होता हुआ गया हूँ. मेरी यात्रा का साक्षी है यह काला तिल... मेरे क्लांत मानस-पथिक का ठहराव-स्थल ! तुम्हारे आँचल के आस-पास किसी चोर सा छुपकर बैठा है यह तिल. यह तिल मेरी सर्जना का उत्स है. यह महाकाव्य है. यह सतत् प्रेरणा है. यह मेरी विजय का प्रतीक है. यह पीड़ाओं के पारावार के मध्य शांति का टापू है. यह पलायन के समय मेरा आश्रय-स्थल है. यह तिल नहीं मेरा दिल है. ◆...

कविताएँ

तीन कविताएँ 1. ओ अलबेले जोगी ! कौन देश तुम चले गये हो मुझे अकेला छोड़कर वेदना की वीथियों में। ये गलियां, जहाँ कभी तुम अकारण आ जाते थे दुनिया से छुप-छुपके मुट्ठी में थोड़ा सा प्रेम लेकर। ये गलियां आज़ विकल तुम्हारी बाट जोहतीं हैं अपलक रात-रात भर जागतीं हैं इन्हें सुलाने आ जाओ ! ये चिर-निद्रा-रत पेड़ यह धरती को दूधिया चांदनी से नहलाता चाँद यह तारिकाओं की मद्धम चमक यही तो था आलिंगनबद्ध होने का सर्वथा उपयुक्त समय ऐसे वक़्त में तुम भला भटकन को लेकर कहाँ निकल गये ? तुम सदियों भटक कर भी नहीं प्राप्त कर सकोगे जोग क्योंकि; तुम्हारे "भिक्षां देहि" के स्वर से टपक पड़ेंगी अतीत की स्मृतियाँ तुम्हारे भिक्षा-पात्र में उतर आएगा मेरा सौंदर्य और तुम्हारी आँखों में मेरी चाहना इससे तुम्हारा संन्यास मार्ग अवरुद्ध होगा। प्रेम में पलायन निष्ठुरता है, नियति नहीं ! प्रेम को प्रतीक्षा की तलवार से काटा नहीं जा सकता प्रेम को वासना की आग से जलाया नहीं जा सकता प्रेम को आँसू सहला सकते हैं, आर्द्र नहीं कर सकते ओ बावले जोगी ! एक बार तुम लौट आओ न वासन्ती हवाओं में  अब भी ...

राजस्थानी गजलां

जीणो व्है तो धार चिड़कली अज़ब गज़ब किरदार चिड़कली मनडा रै काचे आंगणिये लीप प्रीत री गार चिड़कली थारी म्हारी थोथी बातां सोच सकळ संसार चिड़कली गाँव-गळी, चौपाळां व्है'गी बोटां री बाज़ार चिड़कली  इक दिन माटी में मिळ जासी क्यों बाँधे थूं खार चिड़कली पद पइसा नै पावण खातर मिनखपणौ मत मार चिड़कली मीठा बोलां सूं महका दे प्रवीण रो घर द्वार चिड़कली  ____________________________________ आव देख नी ताव बावळी एकर मळवा आव बावळी होठां सूं हाको हो जासी नैणां सूं बतळाव बावळी थारे नैण समद री पाळां अटकी म्हारी नाव बावळी म्हूं तो प्रीत री फ़गत नदी हूँ थारो दिल दरियाव बावळी गैला जग री गैली बातां इणमें मत भरमाव बावळी मुखड़ा सूं सगळा मुळकावै हिवड़े सूं मुळकाव बावळी कागद कागद पीड़ा 'प्रवीण' आखर आखर घाव बावळी  ◆ प्रवीण मकवाणा

कविता

उधर  पीत अंशुक पहने  साँझ उतर रही थी पेड़ों पर धीरे-धीरे इधर  मेरी आँखों में  पसर रही थी तुम्हारी प्रतीक्षा गोधूलि में  पार दिखाई नहीं पड़ता था  लेकिन मैंने सुनी  पंछियों के कलरव में घुली हुई तुम्हारी पदचाप हवाओं के इंगितों में  तुम्हारे आगमन की सूचना थी तुम्हारे स्वागत को उत्सुक थीं  घुमावदार पगडंडियां  निरभ्र आकाश में  तुम्हारी असंख्य छवियां थीं हृदय आतुर था  और अँजुरियां उत्कंठित मैं बैठा रहा रात भर तुम्हारे आने की आश्वस्ति में  लेकिन तुम जाने कहाँ रह गयी थी ?  ◆ प्रवीण मकवाणा