सप्तपदी कविताएँ
सप्तपदी 1. इस दीवाली पर मैंने अपनी मुहब्बत के नाम का एक दीया जलाया दीया बुझ गया मैं समझ गया कि अतीत में आलोक भरने से वर्तमान प्रकाशित नहीं होता ! 2. रामा-श्यामा के दिन मैं भीड़ बीच अकेला खड़ा था दूसरे कोने से कोई आवाज़ देगा, बस इसी प्रतीक्षा में ! 3. रंगोली में एक रंग न होने से कुछ खालीपन सा था मैं रो दिया आँसू ने वो जगह भर दी ! 4. देहरी पर दीप जगमगाये बस नहीं जगमगाया तो कोई चेहरा ! 5. सात धान में छुपा सौभाग्य सिर्फ़ तुम्हारा था यह अब सरासर अतिक्रमण है, अतिक्रमण है ! 6. धन नहीं है, मन नहीं है लेकिन धड़कन है मैं कुछ होने का मातम मना रहा हूँ ! 7. आतिशबाजी में भी कुछ आवाज़ें दबायी न जा सकीं वे माचिस की तीली से आतीं रहीं ! ◆ प्रवीण मकवाणा