कविता
" वैदेही की खोज में ......"
विकीर्ण केश-राशि, श्मश्रु भी
बढ़ आयी है वक्षःस्थल तक
रविमणि सम चक्षु-द्वय बन गयीं हैं
चिंताओं का सलिलाशय
श्लथ बाहुवल्ली, पाणि-पल्लवों में भी
उतर आया है नैराश्य-भाव
कांतिहीन आनन
निज झुर्रियों से ढो रहा है
अगणित आशंकाएं
कर्णाभूषण धोते अपना तन
स्वेद-सीकरों से निरन्तर
कटिदेश क्लांत अति
पाता है संबल कर, तरुवर का बार-बार
उपानहों का अपमान करते
चरण निस्तेज, जड़ हुए
निर्वात ने घेरा सांसों को
कुम्हला गयीं शिराएं
धमनियों का रक्त गतिभंग हुआ
मेधा मर गयी, चेतना
पलायन कर गयी
विजयदुन्दुभि मौन, रुका
जयी अश्वों का दल
लक्ष्मण से संवाद शून्य
हुआ चिर-रव धर्म-कर्म का
प्रश्न किये खग से, मृग से
मधुकर श्रेनी से
यहाँ तक कि प्रस्तरों से भी
तुम्हारे आत्म का अन्वेषण था
सीता को ढूंढने जाना
विश्वास अटल, प्रबल आस
कि प्रणय की पुकार से
लोहा तक गलता है
अपना आकार बदलता है
मूक जन वाणी पाते हैं
पंगु दौड़ लगाते हैं
मूर्च्छा को मिलता है मंत्र जीने का
शिव को साहस विष पीने का !
क्वणन आत्म-नूपुर का
सुन, ईप्साएं नर्तन करतीं थीं
मैत्री मन की
कुटिया तृण की
त्याग शिविकाओं का
राजमहलों का, सिंहासनों का
राम तुम्हारे सारे साधन ही साध्य थे !
फिर क्या दुष्कर था ?
तुमने लाँघा वैभव असीम
अनंत तारिकाएं इन्द्रियों की
लाँघी, 'स्व' की आहुति देकर
ऋत्विज बने तुम सर्व-धर्म-यज्ञ के !
स्नायुओं में गत्वर सतत्
तुम्हारे, जानकी का जगना
उसका चलना, बैठना
हँसना, प्रेमालाप करना
पग-पग पर तुम्हें दे रहा था
सम्बल चलने का, बढ़ने का !
भूमिजा बैठ कहीं भू पर
निहार रही होगी चहुंओर
नहीं दिखे दिनकर तुम उसको
नहीं आओगे स्यात् , यही सोचकर
बह पड़ी होगी वारिधारा
उसके नयन-नगों से !
किंतु समीर तरङ्ग का स्पर्श पाकर
यकायक, प्रफुल्ल पंकज-मुख
हुई होगी प्रिया तुम्हारी
हे राम ! तब उसके हृदय में
अपार भर आया होगा स्नेह
तुम्हारे लिए, आलिंगन को
उद्दीप्त हुईं होंगी लता सम
उसकी कोमल बाहें !
यह अंतर अगाध आस्थामय
पावन यह प्रतीक्षा-क्षण
दृष्टि निर्लिप्त, वृष्टि हृदयाम्बुद
से नेह की निर्मल !
निर्निमेष हो जाना
अतृप्ति भले हो दिखती
किंतु है पूर्णता यह पलकों की !
हे राम ! क्या सीता तुम्हारे पार्श्व नहीं थी ?
क्यों असत्य कहते हो ?
सच बतलाओ, क्यों रघुवर
तुम्हारी अलकों पर अविराम
सीता आसन जमाये नहीं बैठी थी ?
लोचनों में तुम्हारे सीता
लोच बनकर नहीं थी
उपस्थित क्या ?
तुम्हारे कुन्तलों में, जटा में
सीता नहीं थी क्या ?
क्या तुम्हारे संयम में
बचा नहीं था अंश सीता का ?
क्या सीता विवेक में
वाणी में, वचनबद्धता में
तुम्हारे आसपास नहीं थी ?
अब मैं क्या कहूँगा भला ?
तुम अप्रत्याख्येय, मैं मूढ़मति
हे राम ! मुझे कहना था तुमसे
एक बार, बस अंतिम बार
कि; सीता में तुम थे, और
थी तुम्हारे भीतर सीता !
◆ प्रवीण मकवाणा
विकीर्ण केश-राशि, श्मश्रु भी
बढ़ आयी है वक्षःस्थल तक
रविमणि सम चक्षु-द्वय बन गयीं हैं
चिंताओं का सलिलाशय
श्लथ बाहुवल्ली, पाणि-पल्लवों में भी
उतर आया है नैराश्य-भाव
कांतिहीन आनन
निज झुर्रियों से ढो रहा है
अगणित आशंकाएं
कर्णाभूषण धोते अपना तन
स्वेद-सीकरों से निरन्तर
कटिदेश क्लांत अति
पाता है संबल कर, तरुवर का बार-बार
उपानहों का अपमान करते
चरण निस्तेज, जड़ हुए
निर्वात ने घेरा सांसों को
कुम्हला गयीं शिराएं
धमनियों का रक्त गतिभंग हुआ
मेधा मर गयी, चेतना
पलायन कर गयी
विजयदुन्दुभि मौन, रुका
जयी अश्वों का दल
लक्ष्मण से संवाद शून्य
हुआ चिर-रव धर्म-कर्म का
प्रश्न किये खग से, मृग से
मधुकर श्रेनी से
यहाँ तक कि प्रस्तरों से भी
तुम्हारे आत्म का अन्वेषण था
सीता को ढूंढने जाना
विश्वास अटल, प्रबल आस
कि प्रणय की पुकार से
लोहा तक गलता है
अपना आकार बदलता है
मूक जन वाणी पाते हैं
पंगु दौड़ लगाते हैं
मूर्च्छा को मिलता है मंत्र जीने का
शिव को साहस विष पीने का !
क्वणन आत्म-नूपुर का
सुन, ईप्साएं नर्तन करतीं थीं
मैत्री मन की
कुटिया तृण की
त्याग शिविकाओं का
राजमहलों का, सिंहासनों का
राम तुम्हारे सारे साधन ही साध्य थे !
फिर क्या दुष्कर था ?
तुमने लाँघा वैभव असीम
अनंत तारिकाएं इन्द्रियों की
लाँघी, 'स्व' की आहुति देकर
ऋत्विज बने तुम सर्व-धर्म-यज्ञ के !
स्नायुओं में गत्वर सतत्
तुम्हारे, जानकी का जगना
उसका चलना, बैठना
हँसना, प्रेमालाप करना
पग-पग पर तुम्हें दे रहा था
सम्बल चलने का, बढ़ने का !
भूमिजा बैठ कहीं भू पर
निहार रही होगी चहुंओर
नहीं दिखे दिनकर तुम उसको
नहीं आओगे स्यात् , यही सोचकर
बह पड़ी होगी वारिधारा
उसके नयन-नगों से !
किंतु समीर तरङ्ग का स्पर्श पाकर
यकायक, प्रफुल्ल पंकज-मुख
हुई होगी प्रिया तुम्हारी
हे राम ! तब उसके हृदय में
अपार भर आया होगा स्नेह
तुम्हारे लिए, आलिंगन को
उद्दीप्त हुईं होंगी लता सम
उसकी कोमल बाहें !
यह अंतर अगाध आस्थामय
पावन यह प्रतीक्षा-क्षण
दृष्टि निर्लिप्त, वृष्टि हृदयाम्बुद
से नेह की निर्मल !
निर्निमेष हो जाना
अतृप्ति भले हो दिखती
किंतु है पूर्णता यह पलकों की !
हे राम ! क्या सीता तुम्हारे पार्श्व नहीं थी ?
क्यों असत्य कहते हो ?
सच बतलाओ, क्यों रघुवर
तुम्हारी अलकों पर अविराम
सीता आसन जमाये नहीं बैठी थी ?
लोचनों में तुम्हारे सीता
लोच बनकर नहीं थी
उपस्थित क्या ?
तुम्हारे कुन्तलों में, जटा में
सीता नहीं थी क्या ?
क्या तुम्हारे संयम में
बचा नहीं था अंश सीता का ?
क्या सीता विवेक में
वाणी में, वचनबद्धता में
तुम्हारे आसपास नहीं थी ?
अब मैं क्या कहूँगा भला ?
तुम अप्रत्याख्येय, मैं मूढ़मति
हे राम ! मुझे कहना था तुमसे
एक बार, बस अंतिम बार
कि; सीता में तुम थे, और
थी तुम्हारे भीतर सीता !
◆ प्रवीण मकवाणा
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