सुंदर के स्वप्न : डॉ. दलपत सिंह राजपुरोहित
हिंदी कविता की यात्रा में विभिन्न सम्प्रदायों एवं तत्सम्बन्धी सन्तों का अवदान महत् है। सामान्य जनमानस तक ईश्वरीय अवधारणा, जीवन की आचार-सरणियों का सम्प्रेषण रंजक हो, इस हेतु कविता के अतिरिक्त और कोई उपक्रम क्या होगा भला ? इस क्रम में एक महनीय नाम है - सुन्दरदास।
आचार्य शुक्ल, जो कविता के शास्त्र पर अतीव क्रूर प्रतीत होते हैं, सन्तों की कविताओं को उपदेशात्मक-उक्तियाँ मात्र मानते हैं; वो भी सुन्दरदास को श्लाघ्य शब्दों में कवि स्वीकारते हैं। सुंदर छान्दसिक-कविता में स्वनामधन्य श्लेष-नियोजना हैं।
यद्यपि मध्यकालीन हिंदी साहित्य में हाथ डालना कोई सरल कार्य नहीं। इसका कारण है, जो कविताएँ सुनने-पढ़ने में सीधी-सपाट लगती हैं, उनकी अर्थवत्ता एवं प्रयोजनीयता खोलना श्रमसाध्य-कर्म है। इसलिए यह कार्य प्रायः अधीती-प्रज्ञा वाले लोग करते रहे हैं। तथापि डॉ. राजपुरोहित ने यह कार्य न केवल सफलतापूर्वक किया अपितु अपनी विशद मेधा से शोधन कर सुंदर-कविता के नवीन आयाम उघाड़े हैं।
कोई शोध कार्य प्रामाणिक, शास्त्रसिक्त होकर भी इतना पठनीय एवं रुचिकर हो सकता है, यह सचमुच सुखद अचरज है। सुंदरदास मध्यकाल का प्रातिस्विक नाम है। उनकी कविताओं का स्वर अन्य सन्त-कवियों से किंचित विलग है। मुझे उनका दर्शन रूप मोहता है।
भक्ति भक्त, माया जगत, ज्ञानी सबको सीस -- सुन्दरदास ने ज्ञानमार्ग की महत्ता को रेखांकित किया है। सुंदर-कविता में अद्वैत-वेदान्त की इसी छटा के कारण उन्हें " दूसरा शंकराचार्य " से अभिहित किया गया -
संक्राचारय दूसरौ, दादू के सुंदर भयौ
द्वीत भाव कर दूरि, एक अद्वीत ही गायौ।
उक्त पुस्तक में लेखक दादूपंथ की उत्पत्ति से प्रारम्भ करते हैं तथा आधुनिक कविता एवं तद्विषयक प्रयोजनमूलकता पर पहुँचते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि लेखक आयातित वैचारिकी अथवा निकषों से सुन्दरदास के काव्य का मूल्यांकन नहीं करते। वो देशजता का अभिनिवेश करते हैं। किन्तु ऐसा नहीं कि वो किसी वैचारिकी-विशेष में सुंदरदास को रखने से भयभीत हैं। उन्होंने लगभग सभी विमर्शों को संस्पर्श किया है। यही उनका लेखकीय कौशल है।
देशज निकष पर कविता का मूल्यांकन एवं उसकी उपादेयता सम्पूर्ण विमर्श शृंखलाओं को छुए - लेखक की यह मेधा भारतीय चिंतन की मूल धारा का विस्तार एवं युगीन विकास है।
सुंदर के उपदेश एवं लेखक का शोध -- दोनों का अवलम्ब भारत की आर्ष-मनीषा है। यह जानना सुखकर है।
श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, योगवासिष्ठ, उपनिषद, हठयोगप्रदीपिका, दत्तात्रेय-संहिता प्रभृति ग्रन्थों से सार संग्रह कर पाना सचमुच शोध की प्रामाणिकता सिद्ध करता है।
अनुसन्धित्सु डॉ. राजपुरोहित तत्कालीन पार्श्विकता का विस्मरण नहीं करते। उन्होंने वे सभी प्रवृत्तियां रेखांकित की हैं, जो सुन्दरदास के समय उनके आसपास अवस्थित थीं अथवा पुष्पित-पल्लवित हो रहीं थीं।
पुस्तक " सुंदर के स्वप्न " हिंदी कविता के गम्भीर अध्येताओं के लिए तो महत्वपूर्ण है ही, यह पुस्तक उनके लिए भी आवश्यक जान पड़ती है, जिनकी रुचि सम्प्रदायों एवं उनकी परम्परा को जानने-समझने में है।
डॉ. दलपत सिंह राजपुरोहित जी को इस महत्वपूर्ण एवं प्रभविष्णु कार्य के लिए अशेष बधाई एवं सादर कृतज्ञता भी कि आपने एक अभाव को नव-दृष्टि से भरा है, जिसके माध्यम से मेरे जैसा अकिंचन शोधार्थी भी सन्त-साहित्य का आस्वादन कर सका।
प्रवीण कुमार मकवाणा
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