दुःख

दुःख महज़ आकर्षण नहीं 
कि एक दिन काल की क्रूर भट्टियों में गल जाएगा। 

दुःख सत्व है, सतत् आवृत्त है 
वह लौट कर आता है 
जैसे पिङ्गला का पुराना-प्रेम। 

◆ प्रवीण मकवाणा

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