हिंदी कविता की यात्रा में विभिन्न सम्प्रदायों एवं तत्सम्बन्धी सन्तों का अवदान महत् है। सामान्य जनमानस तक ईश्वरीय अवधारणा, जीवन की आचार-सरणियों का सम्प्रेषण रंजक हो, इस हेतु कविता के अतिरिक्त और कोई उपक्रम क्या होगा भला ? इस क्रम में एक महनीय नाम है - सुन्दरदास। आचार्य शुक्ल, जो कविता के शास्त्र पर अतीव क्रूर प्रतीत होते हैं, सन्तों की कविताओं को उपदेशात्मक-उक्तियाँ मात्र मानते हैं; वो भी सुन्दरदास को श्लाघ्य शब्दों में कवि स्वीकारते हैं। सुंदर छान्दसिक-कविता में स्वनामधन्य श्लेष-नियोजना हैं। यद्यपि मध्यकालीन हिंदी साहित्य में हाथ डालना कोई सरल कार्य नहीं। इसका कारण है, जो कविताएँ सुनने-पढ़ने में सीधी-सपाट लगती हैं, उनकी अर्थवत्ता एवं प्रयोजनीयता खोलना श्रमसाध्य-कर्म है। इसलिए यह कार्य प्रायः अधीती-प्रज्ञा वाले लोग करते रहे हैं। तथापि डॉ. राजपुरोहित ने यह कार्य न केवल सफलतापूर्वक किया अपितु अपनी विशद मेधा से शोधन कर सुंदर-कविता के नवीन आयाम उघाड़े हैं। कोई शोध कार्य प्रामाणिक, शास्त्रसिक्त होकर भी इतना पठनीय एवं रुचिकर हो सकता है, यह सचमुच सुखद अचरज है। सुंदरदास मध्यकाल क...
भस्म में रमी सिद्धिनी उतर आयी मसान साधना से वह मंत्र मानिनी एकटक देखती जाती कि निर्जन वन में कौन यह जोगी ? गेरुआ आवेष्टिता देह, कुंडल सुशोभित कर्ण उन्नत ललाट और विस्तीर्ण जटा हृदय की दुर्बलताएँ पहले आंखों में जन्मतीं हैं जब प्रेम-परस से टूटी अवधूत की समाधि, समक्ष प्रस्तुत थी प्रणय-याचना सूत कातने का निवेदन नहीं सुहाया रास नहीं आयीं दैहिक लालचाएँ वज्रमन में घर क्योंकर करतीं वासना की पहनियाँ ? सिद्धिनी ने तब पहली बार यह जाना कि कुंडलिनी से अधिक दुष्कर है प्रेम जगाना .... यह इतिहासों में लिखा सच है कि उस दिन प्रेम हारा और जीता जोग लेकिन अगले दिन एक अचरज हुआ शम्भू रोट चढ़ाने के बाद गोरख ने कुंड में विसर्जित कर दीं ताम्रपत्रों पर खुदी घोषणाएं जिनमें लिखा था कि "गोरख कभी गर्त में नहीं गिरते" कभी-कभी प्रेम पूरे पेड़ को नहीं हिला सकता तब भी उसकी एक पत्ती में विचलन पैदा कर जाता है ◆ प्रवीण मकवाणा
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