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स्मृति-लेख _________________________ फूफाजी आ. शिवलाल जी देवड़ा की चिर-विच्छित्ति : एक युग का अवसान मैंने इस वर्ष शृंखलाबद्ध रूप से अपने आत्मस्थ प्रियजन खोये हैं। मित्र विकास से शुरू हुई वियुक्ति-यात्रा अनुजा ललिता से होते हुए दो दिन पहले मोहन जी, चाचा ( पापा के ममेरे भाई ) तक आ पहुंची ... और आज मेरे अतीव आत्मीय फूफाजी का देहावसान 😢😢 यह असह्य पीड़ा जो अनन्य अनुराग के व्याज उपजी है। अपने उपास्य कवि भवभूति के शब्दों में कहूं तो -- संतापकारिणो बन्धुजनविप्रयोगा भवन्ति....( अपने लोगों का  बिछुडना दु:खदायक होता है )  फूफाजी स्वयमेव सरकार थे। उनके इंगितों पर आज तक गाँव चलता आया था। उनकी बात की काट किसी के पास नहीं होती। वो जो कहते, कानून होता,, वो जहाँ जाते नये प्रतिमान गढ़ते। उनका सर कहीं झुका तो देव-मन्दिर की चौखट पर .... ऐसा स्वाभिमानी आदमी मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। एक पंक्ति में उनकी समष्टिगत स्थिति कहना चाहूं तो यही कहूंगा -- वो बैठकों का उल्लास थे। उन्हें सब एक कान होकर सुनते। वो बाँह चढ़ाकर जब बातों का रंग जमाते तो हर कोई सुनता रह जाता। उनका उक्ति-वैचित्र्य अनुपम ...