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Showing posts from February, 2020

तुम निष्काम आराधना हो !

तुम हो कोयल कंठ-रव सी, कोमल पँखुङी सी, हरीतिमा पर छाई गुनगुनाती धूप सी हो तुम.... तुम निर्मल निर्झर हो पहाड़ों की कोख से निःसृत होकर कल-कल के मधुरिम संगीत के साथ धरा पर उतरता हुआ ! तुम हो पावन सा कोई पद मीरा का, तुलसी सा अर्थ-गर्भत्व लिए जब-जब तुम ढलती हो घनानंद के छंद विधान में जायसी की अनुराग-वीथियों से होकर तब-तब झंकृत हो उठते हैं सहसा ही अन्तस् के सुषुप्त तार ! तुम हो कान्हा की बांसुरी की कर्णप्रिय स्वर-लहरी घोलती जो मेरे जीवन-पनघट में अनहद मिठास, असीम उल्लास ! तुम हो राम के सीता-चिंतन का अनुपम आख्यान, मेरे सौमित्र-चित्त में समाहित उर्मिला के एकांत सी अनन्य निष्ठा हो तुम ! तुम हो शकुंतला का साहस, सावित्री का अदम्य प्रण, मैत्रयी की अद्भुत मेधा, तुम उभय भारती-सा चातुर्य हो कि जिसके सामने अनुत्तरित हो जाता है मेरी शास्त्रीय प्रज्ञा का शंकर ! तुम हो मरुथल की मरवण का स्नेहिल-संवाद, जेठवा के सोरठों की सौंधी-सौरभ, कमली की उत्कट अभिलाषा, तुम गोबर लीपती औरतों का निश्छल अपनापन हो ! तुम अर्चना हो, वंदना हो किसी शिवालय के गर्भगृह में महामृत्युंजय...
आषाढ़ का एक दिन - मोहन राकेश ____________________________________ कालिदास मेरी चेतना में समाविष्ट प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं. उनके वाङ्मय से गुजरना जैसे तप्त मौसम में किसी पानीदार लता से आलिंगन करना होता है. उनके कृतित्व-व्यक्तित्व पर लिखा अक्षर-अक्षर मेरी स्मृति-कोश का अमूल्य मौक्तिक है. मैं उसे प्रलय की स्थिति में भी सहेजना चाहूँगा ! आज़ मोहन राकेश की कृति "आषाढ़ का एक दिन" पढ़ी. मोहन राकेश मेरे प्रिय कथाकारों में से हैं. वो एक निर्झर की तरह बहते जाते हैं...उनका लेखन मुझे सम्मोहित करता है. आज़ का अवसर मेरे दो प्रिय कथाकारों के मिलन का था...सो मन रमता ही गया. कालिदास और मल्लिका ग्राम-प्रांतर के हतीतिमाच्छादित पहाड़ों में विचरते हुए मेघ-मालाओं को निहारते और उसमें कहीं अपनी प्रतिच्छाया देखने की स्नेहसिक्त चेष्टा करते. मल्लिका के कोमल मन-आँगन की भाव-लताओं का स्पर्श कालिदास के काव्य में उतरता और आषाढ़ मास की बारिश बनकर धरा पर बरस पड़ता तो दोनों प्रेमी-मनों के साथ-साथ समस्त प्राणिजगत आह्लादित हो जाता. कालिदास की नियति में कुछ समय का राजयोग था. यह "नियति" ग्रा...

थळ कांता

निरंजना सी लड़की निहारती रहती खेजड़ी की समाधिलीन शाखें उसकी पनीली आँखों में तैरता था मरुथल और कुंतलों में लहराती निस्तब्धता वो उजले धुल-कणों में ढूंढती फिरती प्यार का स्पर्श ग्वालों से पूछती अपने प्रेमी का पता पशुओं के पग-चिह्नों को बैठ दुलारती गोबर की सुवास से अपना मार्ग बदलती सांवली लड़की तप्त-हवाओं के कानों में कुछ बतियाती आवणकी के फूलों से किंचित् मन बहलाती, फिर लू के पीठ पर सवार हो चल पड़ती यह ऊंटों वाला देस, यहाँ धँसते पाँवों में समाता यात्रा का अथक साहस सूखते कंठ में घुलती अपार अभीप्सा और अवसन्न आत्मा को मिलता असीम आकाश का आसरा वो कभी थकती नहीं वो कभी रूकती नहीं प्रेम की और थळ-कांताओं की एक ही रीति है. ◆ प्रवीण मकवाणा