तुम निष्काम आराधना हो !

तुम हो
कोयल कंठ-रव सी,
कोमल पँखुङी सी,
हरीतिमा पर छाई गुनगुनाती धूप सी हो तुम....

तुम निर्मल निर्झर हो
पहाड़ों की कोख से निःसृत होकर
कल-कल के मधुरिम संगीत के साथ
धरा पर उतरता हुआ !

तुम हो
पावन सा कोई पद मीरा का,
तुलसी सा अर्थ-गर्भत्व लिए
जब-जब तुम ढलती हो घनानंद के छंद विधान में
जायसी की अनुराग-वीथियों से होकर
तब-तब झंकृत हो उठते हैं सहसा ही
अन्तस् के सुषुप्त तार !

तुम हो
कान्हा की बांसुरी की
कर्णप्रिय स्वर-लहरी
घोलती जो मेरे जीवन-पनघट में
अनहद मिठास, असीम उल्लास !

तुम हो
राम के सीता-चिंतन का
अनुपम आख्यान,
मेरे सौमित्र-चित्त में समाहित
उर्मिला के एकांत सी
अनन्य निष्ठा हो तुम !

तुम हो
शकुंतला का साहस,
सावित्री का अदम्य प्रण,
मैत्रयी की अद्भुत मेधा,
तुम उभय भारती-सा चातुर्य हो
कि जिसके सामने अनुत्तरित हो जाता है
मेरी शास्त्रीय प्रज्ञा का शंकर !

तुम हो
मरुथल की मरवण का स्नेहिल-संवाद,
जेठवा के सोरठों की सौंधी-सौरभ,
कमली की उत्कट अभिलाषा,
तुम गोबर लीपती औरतों का
निश्छल अपनापन हो !

तुम अर्चना हो, वंदना हो
किसी शिवालय के गर्भगृह में
महामृत्युंजय मंत्र की गूँज सी
तुम निष्काम आराधना हो...!

-- प्रवीण मकवाणा 

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