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Showing posts from March, 2021

दुःख

दुःख महज़ आकर्षण नहीं  कि एक दिन काल की क्रूर भट्टियों में गल जाएगा।  दुःख सत्व है, सतत् आवृत्त है  वह लौट कर आता है  जैसे पिङ्गला का पुराना-प्रेम।  ◆ प्रवीण मकवाणा

मैं देख पा रहा हूँ एक प्रलय की लीला

अमूर्त का नर्तन विस्मित नहीं करता प्रत्यूष-काल में सँवरती निशा अचरज नहीं जगाती  घुप्प अँधियारे में भी कुछ है, जो ओझल नहीं होता मैं देख पा रहा हूँ एक प्रलय की लीला।  आर्द्र स्वप्न उन आंसुओं की तरह सूख गये जिन्हें गोपिकाओं ने कान्हा के वियोग में पनघट पर बहाया था।  वे कुंतल अब कभी हरे नहीं होने जिनकी छाँव में क्लांत तन-मन विश्राम करते थे।  उस गले पर के चुम्बन अब उतर आए होंगे देह से पानी बहुत कुछ धोता है समय के साथ।  जोगियों के धूने से उठती ताम्रवर्णी सुवास  सारे संसार में फैला दी जाए  कि अब कुछ भी निरापद नहीं रहा।  दर्शन डांवाडोल पड़े हैं  विचार हारे थके खड़े हैं दिगंत तक नहीं दीखता कोई अवलंब  एक प्राण को बचाने कौन आएगा ?  क्षितिज की चाह में  कई अंतरिक्ष आजीवन कोरे रहे।  ◆ प्रवीण मकवाणा

कविता ( मैं उस लड़की का ऋणी हूँ )

उसे नींद बेहद प्यारी थी लेकिन वह रात भर जागती मेरे लिए, बातें करती।  मैं बेवज़ह उस पर गुस्सा करता वह रजस्वलावती प्यार जताती।  यह जाने बिना कि अब उसके आसपास कौन होगा मैं उसे कॉल करता, मेसेज करता  वह कभी नहीं बिगड़ती।  अपना पक्ष भी नहीं रखती माफ़ी माँगती और कहती - गुस्सा छोड़ो, गले लगाओ मुझे।  मैं खा-पीकर चिल्लाता था वह उपवास रखती, मुझे सहती।  उसका परिवार था, भाई था, बहनें थीं।  उसकी माँ मेरी माँ जितनी ही प्यारी थी।  पापा भी मेरे पापा जितने ही सख़्त थे।  वह पेड़ की एक डाल थी जो बिना कटे, दूसरे पेड़ की एक डाल से लिपटना चाहती थी।  कई बार उसके पैसों से मैंने सफ़र किया। कई बार उसके पैसों से खरीदी किताबें मैंने पढीं।  कई बार उसके बदन से मैंने अपनी भूख मिटायी।  मुझे आज तक याद है- एक-एक बस टिकट, किताबों के शीर्षक और उसका कम्पित शरीर।  वह खुद नहीं रोती थी लेकिन मेरे आँसू पोंछने का अभ्यास था उसे।  वह चिंता में होती तो मुझे कॉल नहीं करती यह जानकर कि कहीं मुझे भी चिंता न हो जाए।  वह पीड़ाएं छुपाकर प्यार जताती थी।  प्यार की यात्रा...