कविता ( मैं उस लड़की का ऋणी हूँ )
उसे नींद बेहद प्यारी थी
लेकिन वह रात भर जागती मेरे लिए, बातें करती।
मैं बेवज़ह उस पर गुस्सा करता
वह रजस्वलावती प्यार जताती।
यह जाने बिना कि अब उसके आसपास कौन होगा
मैं उसे कॉल करता, मेसेज करता
वह कभी नहीं बिगड़ती।
अपना पक्ष भी नहीं रखती
माफ़ी माँगती और कहती - गुस्सा छोड़ो, गले लगाओ मुझे।
मैं खा-पीकर चिल्लाता था
वह उपवास रखती, मुझे सहती।
उसका परिवार था, भाई था, बहनें थीं।
उसकी माँ मेरी माँ जितनी ही प्यारी थी।
पापा भी मेरे पापा जितने ही सख़्त थे।
वह पेड़ की एक डाल थी
जो बिना कटे, दूसरे पेड़ की एक डाल से लिपटना चाहती थी।
कई बार उसके पैसों से मैंने सफ़र किया।
कई बार उसके पैसों से खरीदी किताबें मैंने पढीं।
कई बार उसके बदन से मैंने अपनी भूख मिटायी।
मुझे आज तक याद है-
एक-एक बस टिकट, किताबों के शीर्षक और उसका कम्पित शरीर।
वह खुद नहीं रोती थी
लेकिन मेरे आँसू पोंछने का अभ्यास था उसे।
वह चिंता में होती तो मुझे कॉल नहीं करती
यह जानकर कि कहीं मुझे भी चिंता न हो जाए।
वह पीड़ाएं छुपाकर प्यार जताती थी।
प्यार की यात्रा में हम दोनों थे
मुझे मंजिल चाहिए थी और उसे मेरा साथ।
मैं उस लड़की का ऋणी हूँ
जिसने कई विवशताओं के बावज़ूद भी मुझसे प्यार किया
सिर्फ प्यार।
उसने सिर्फ दिया, लिया कुछ नहीं।
-- प्रवीण मकवाणा
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