Posts

Showing posts from September, 2020

एक लज्जित नागरिक की तरफ़ से ......

लज्जित नागरिक की तरफ़ से .....  यदि पालघर में हुई साधुओं की हत्या के लिए महाराष्ट्र सरकार एवं पुलिस प्रशासन जिम्मेदार है तो मनीषा के रात्रि शवदाह के लिए उत्तरप्रदेश सरकार एवं पुलिस प्रशासन जिम्मेदार क्यों नहीं ??  पुलिस क्या करती है; आपके साथ कोई वाक़या नहीं हुआ तो आप नहीं समझ पाएंगे। मैंने अपनी बहन का शव अस्पताल के चंगुल के मुक्त कराने के लिए प्रशासन के आगे हाथजोडी की है, मैं यह दर्द अच्छे से समझ सकता हूँ।  अचरज है कि कुछ लोग अलग-अलग एंगल निकाल लाये हैं। हद्द है कि कुछ को दलित-स्वर्ण, किसी को कंगना-मनीषा तो किसी को अर्णब-रवीश का कोण नज़र आ रहा है। अपनी खुद की बहन बेटी के साथ अगर ऐसा हो जाये तब भी यही दलाली करोगे क्या ? वक़्त मिल जाये तो कलेजे पर हाथ रखकर विचारना .... बेटी सिर्फ़ बेटी होती है। नाना विमर्श कोरी राजनीति है, पार्टी प्रोपोगेंडा है।  आपकी राजनीतिक निष्ठा समझ में आती है, लेकिन उसके लिए अपनी बहन बेटियों की इज्ज़त दांव पर मत लगाइए !  कंगना को बेवज़ह घसीटने वाले भी एक बेटी की ताक़त को कोसते ही हैं... वे परोक्ष रूप से ड्रग्स माफियाओं के पक्ष में जा खड़े होते हैं। ...

पीड़ाओं की प्रतिध्वनियां ( मेरी डायरी )

"अब मुझे तुम भूल जाना ....." कितनी आसानी से कह दिया था तुमने व्हाट्सएप्प पर एक सन्देश भेजकर ।  क्या वाकई यह इतना आसान होगा ? तुम मेरी छोड़ो अपनी सोचो .... क्या उसके गले में अपनी बाहों का हार पहनाते हुए अपना पहला आलिंगन तुम्हें याद नहीं आएगा ?  स्मरण है तुम्हें .. गाड़ी का गियर बदलते वक़्त तुम्हारे हाथ की अँजुरियां जो मेरी अँजुरियों में फंसी हुईं थीं, मुझे तरंगायित कर रही थी..सदैव साथ रहने का विश्वास प्रगाढ़ कर रहीं थीं... कभी वो हाथ मेरे बालों को सहलाने चला जाता तो तुम दायें हाथ से गियर बदलती... क्या ये मासूम लम्हें तुम्हारे चित्त में नहीं चुभेंगे ?  _____________________________________ तुम्हें जाना है न... जाओ !  लेकिन क्या तुमसे रसवंती चुम्बनों की झड़ी विस्मृत हो पाएगी ?  तुम जब उसकी गोद में सोने की इच्छा जतलाओगी तो क्या तुम्हारी गोद में सुलाने का आग्रह करती मेरी बच्चों सी जिद्द तुम्हारा रास्ता नहीं रोकेगी ?  तुम उसकी किसी बात पर ठहाका कैसे लगाओगी ? इस प्रश्न पर मैं ठीक से सोच नहीं पाया। बेबात हंसना, मुस्कुराना.... चिढ़ाना एक दूसरे को, कैसे एक फॉर्मेट में ढल प...

महाकवि की प्रेमिका का पलायन

हमारे एक मित्र थे महाकवि। महाकवि इसलिए नहीं कि उन्होंने मेघदूत की टक्कर का कोई साहित्य रच डाला हो; अपितु उनका महाकवित्व शुद्धतावाद पर आधृत था। जहां हमारे दूसरे कवि मित्र हर जगह लार टपकाये घूमते; वहीं महाकवि एकल प्रेमिकाव्रती थे। यही उनका महाकवित्व था। महाकवि थे बड़े फेमिनिस्ट। नारियल को भी नारियली कहते। आज तक उनके मुखारविंद से दो प्रजातियों के लिए ही प्रशंसा निकली थी- एक तो स्वयं के लिए, दूसरी स्त्रियों के लिए। अन्यथा वो पुरुषों की कटी ऊँगली पर पेशाब नहीं करते। स्त्रियों का विषय आता तो तर्कों के तम्बू गाड़ देते। चलते-चलते मार्ग में ही लम्बा चौड़ा भाषण महिला सशक्तीकरण पर दे देते। मैं उन्हें सचेत करता रहता कि "भणी तोई भारजा ... " ( भले पढ़ी लिखी है, पर स्त्री है ) लेकिन महाकवि लक्ष्य से विचलित नहीं होते। महाकवि-अर्जुन को मैडम की आंख दीखती, बस। महाकवि वेदों-उपनिषदों जहां से बन पड़ता अच्छी-अच्छी उक्तियाँ उठाते और स्त्री सम्मान में परोसते। एक मैडम के चक्कर में सृष्टि की सम्पूर्ण स्त्रियों पर बोलने का अप्रत्यक्ष ठेका लेने वाले महाकवि भीतर ही भीतर भचीड तो लेते होंगे, पर बेचारे क्या करें ...

ग़ज़ल

विश्व की सब चेतना क्यों सो रही है खून के आँसू धरा जब रो रही है !! तारिकाएं ही तमस फैला रहीं हैं व्योम की आलोचना क्यों हो रही है ?? अनवरत विस्तार बढ़ता जा रहा है प्रीत अपनी थाह लेकिन खो रही है !! चिर उनींदा पेड़ के मानस पटल पर वायु मिथ्या धारणाएं बो रही है !! हो रहे हैं राज्य हित निश्चेष्ट माधव चीर की चिंता भला किसको रही है ?? नत नयन होकर खड़ा है न्याय भू का नीति भी वैधव्य निर्मम ढो रही है !! वेदना के घट सभी रीते पड़े हैं कौन सुधि मेरे दृगों को धो रही है !! ◆ प्रवीण मकवाणा

पीड़ाओं की प्रतिध्वनियां ( मेरी डायरी )

समय अपनी गति से चलता जाता है और मैं यथास्थान जड़वत खड़ा हूँ जैसे बालू में धँसा रथ-चक्र !  पावस आयी, अब जाने को है। हरीतिमा खिली, सब मार्ग धुले। नहीं धुल पाया तो एक कषाय मन। जिसका कि कभी मौसम नहीं बदलता। मैं विगत को पकड़ने की चाह में हाथ बढ़ाता हूँ तो वह बिजली सा कौंध पीछे हो लेता है। मेरा अतीत-मोह है कि छूटता ही नहीं।  कुछ अभिलाषाएं विटप-वल्लरी पर से फिसलती बूंदों की तरह होतीं हैं; पर्ण पर ठहरतीं नहीं, लेकिन उसे आर्द्र कर जातीं हैं। उफ्फ़ यह पानीदार प्यास ......  सोचता हूँ - जब प्राप्य था तो मैं उसे साधारण समझता रहा। अब जब उसका सामीप्य नहीं है तो उसकी महत्ता कितने हजार गुणा बढ़ गयी है। वो स्यात ही विश्वास करे। एक अपराध जो भीतर से खाये जा रहा है-- मैं ढो रहा हूँ।  बेटे की बाट जोहती माँ की एक जोड़ी थकी आंखों सा हूं मैं ! दर्शन-हीन, रुदन निरन्तर और अनवरत विकलता।  ◆प्रवीण मकवाणा