महाकवि की प्रेमिका का पलायन

हमारे एक मित्र थे महाकवि। महाकवि इसलिए नहीं कि उन्होंने मेघदूत की टक्कर का कोई साहित्य रच डाला हो; अपितु उनका महाकवित्व शुद्धतावाद पर आधृत था। जहां हमारे दूसरे कवि मित्र हर जगह लार टपकाये घूमते; वहीं महाकवि एकल प्रेमिकाव्रती थे। यही उनका महाकवित्व था।

महाकवि थे बड़े फेमिनिस्ट। नारियल को भी नारियली कहते। आज तक उनके मुखारविंद से दो प्रजातियों के लिए ही प्रशंसा निकली थी- एक तो स्वयं के लिए, दूसरी स्त्रियों के लिए। अन्यथा वो पुरुषों की कटी ऊँगली पर पेशाब नहीं करते। स्त्रियों का विषय आता तो तर्कों के तम्बू गाड़ देते। चलते-चलते मार्ग में ही लम्बा चौड़ा भाषण महिला सशक्तीकरण पर दे देते। मैं उन्हें सचेत करता रहता कि "भणी तोई भारजा ... " ( भले पढ़ी लिखी है, पर स्त्री है ) लेकिन महाकवि लक्ष्य से विचलित नहीं होते। महाकवि-अर्जुन को मैडम की आंख दीखती, बस।

महाकवि वेदों-उपनिषदों जहां से बन पड़ता अच्छी-अच्छी उक्तियाँ उठाते और स्त्री सम्मान में परोसते। एक मैडम के चक्कर में सृष्टि की सम्पूर्ण स्त्रियों पर बोलने का अप्रत्यक्ष ठेका लेने वाले महाकवि भीतर ही भीतर भचीड तो लेते होंगे, पर बेचारे क्या करें ? मधुर आवाज़ में " आई लव यू " सुनने की तमन्ना जो न करवाये कम है।

महाकवि का अपनी प्रेमिका के प्रति अनन्य समर्पण था। वो आज के ज़माने में मैडम के लिए गजरा लेकर जाते, आप समझ सकते हैं। जब मिलते तो आलिंगन से अधिक चिंता करते। यह पूछना नहीं भूलते - आप यहां तक आयीं, रस्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई ? 

मैं कहता महाकवि पागल हो गये हो क्या ? वो आपकी प्रेमिका है। पर्याप्त बड़ी है उम्र में; कोई बच्ची थोड़ी है। महाकवि झल्लाते - " प्रेम में पड़ी हर स्त्री बच्ची ही तो है। " .... वो यह भूल जाते कि मैडम का एक बच्चा है। ख़ैर ....

एक रात महाकवि फोन की स्क्रीन चूमते हुए मैडम से बात ख़त्म कर चुके थे। उनका मन नहीं लग रहा था जैसे तुलसी बाबा का रत्ना मैया के पीहर जाने पर के पश्चात नहीं लगता। अनमने ढंग से यूट्यूब चलाया, वहां एक भजन तैर रहा था - समय को भरोसो कोनी, कद पलटी मार जावै। महाकवि ने भजन सुना और सो गये। 
सुबह हुई तो समय वाक़ई पलटी मार चुका था। ग्रह-नक्षत्र मुंह मोड़े हुए खड़े थे। उनचास पवन उदास थीं और महाकवि हताश .... डेयरी पर दूध लेने आये महाकवि से मैंने पूछा - क्यों महाकवि गौरेया के घोंसले के तरह मुंह लटकाए घूम रहे हो ? महाकवि ने एक ही वाक्य में जवाब दे दिया - मैडम मूव ऑन कर'गी ! 

मैडम ने महाकवि के फोन उठाने बंद कर दिये। व्हाट्सप, फेसबुक पर ब्लॉक। महाकवि का स्त्री विमर्श घायल जटायु की तरह चटपटा रहा था। कोई राह नहीं सूझ रही थी। वो रह-रहकर मैडम की प्रोफाइल टटोलते, डीपी देखते और फोन साइड बटन से लॉक कर बेड पर पटक देते। महाकवि सरगुजा पर्वत के विरही यक्ष से अधिक तड़प रहे थे। गर्मी में बादल भी नहीं, सन्देसा भेजें तो किसके माध्यम से ?

मुझसे महाकवि की हालत देखी नहीं गयी। दूसरे दिन उन्हें सांत्वना देने पहुंच गया। वहां पहुंचकर क्या देखता हूँ कि महाकवि पाँव पसारे बेड पर पड़े हैं। उपनिषद-अनुयाता अकर्मण्य ! 

मैंने समझाया - " महाकवि! प्रेमिका सपने का धन है। जब तक हम नींद में हैं, वह धन अपना है; नींद खुलते ही धन और पेटी दोनों गायब। महाकवि ! आपकी भी चिर-निद्रा अभी खुली है। मैडम का अपना परिवार है, आप फलने-पलने दीजिये। उसका एक लड़का है उसे वक़्त देना होता है मैडम को। आप क्यों खामखा बीच मे टांग अड़ाते हैं ? 

मैं दर्शन झाड़कर आ गया,, महाकवि ने मेरे आ जाने के बाद किताबें झाड़ी, स्त्री-विर्मश का चश्मा उतारा, नम्बर वाला चश्मा पहना और कई दिनों बाद किताबों को भीतर से देखा, पढ़ा। 

महाकवि ने कुछ दिन पहले सूचना दी कि उनका काव्य-संग्रह आ रहा है। मैं सोचता हूँ - प्रेमिका के पलायन ने एक महाकवि को कवि बना दिया।

◆ प्रवीण मकवाणा

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