मैं देख पा रहा हूँ एक प्रलय की लीला

अमूर्त का नर्तन विस्मित नहीं करता
प्रत्यूष-काल में सँवरती निशा अचरज नहीं जगाती 
घुप्प अँधियारे में भी कुछ है, जो ओझल नहीं होता
मैं देख पा रहा हूँ एक प्रलय की लीला। 

आर्द्र स्वप्न उन आंसुओं की तरह सूख गये
जिन्हें गोपिकाओं ने कान्हा के वियोग में पनघट पर बहाया था। 

वे कुंतल अब कभी हरे नहीं होने
जिनकी छाँव में क्लांत तन-मन विश्राम करते थे। 
उस गले पर के चुम्बन अब उतर आए होंगे देह से
पानी बहुत कुछ धोता है समय के साथ। 

जोगियों के धूने से उठती ताम्रवर्णी सुवास 
सारे संसार में फैला दी जाए 
कि अब कुछ भी निरापद नहीं रहा। 

दर्शन डांवाडोल पड़े हैं 
विचार हारे थके खड़े हैं
दिगंत तक नहीं दीखता कोई अवलंब 
एक प्राण को बचाने कौन आएगा ? 

क्षितिज की चाह में 
कई अंतरिक्ष आजीवन कोरे रहे। 

◆ प्रवीण मकवाणा

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