आषाढ़ का एक दिन - मोहन राकेश
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कालिदास मेरी चेतना में समाविष्ट प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं. उनके वाङ्मय से गुजरना जैसे तप्त मौसम में किसी पानीदार लता से आलिंगन करना होता है. उनके कृतित्व-व्यक्तित्व पर लिखा अक्षर-अक्षर मेरी स्मृति-कोश का अमूल्य मौक्तिक है. मैं उसे प्रलय की स्थिति में भी सहेजना चाहूँगा !
आज़ मोहन राकेश की कृति "आषाढ़ का एक दिन" पढ़ी. मोहन राकेश मेरे प्रिय कथाकारों में से हैं. वो एक निर्झर की तरह बहते जाते हैं...उनका लेखन मुझे सम्मोहित करता है.
आज़ का अवसर मेरे दो प्रिय कथाकारों के मिलन का था...सो मन रमता ही गया.
कालिदास और मल्लिका ग्राम-प्रांतर के हतीतिमाच्छादित पहाड़ों में विचरते हुए मेघ-मालाओं को निहारते और उसमें कहीं अपनी प्रतिच्छाया देखने की स्नेहसिक्त चेष्टा करते. मल्लिका के कोमल मन-आँगन की भाव-लताओं का स्पर्श कालिदास के काव्य में उतरता और आषाढ़ मास की बारिश बनकर धरा पर बरस पड़ता तो दोनों प्रेमी-मनों के साथ-साथ समस्त प्राणिजगत आह्लादित हो जाता.
कालिदास की नियति में कुछ समय का राजयोग था. यह "नियति" ग्राम से राजधानी उज्जयिनी पलायन लेकर आयी. और साथ ले आयी, गुप्त राजदुहिता प्रियंगुमञ्जरी के साथ परिणय और कश्मीर का सिंहासन !
कालिदास यह राजकवि का सम्मान नहीं चाहते थे. लेकिन जगदम्बा के मंदिर जाकर मल्लिका ने ही उन्हें इस प्रस्ताव के लिए मनाया था. इस तरह कालिदास उनसे बिछड़ गये थे.
वो मन जो हरिणशावक की केलियों में रमा करता था...आज़ तड़प उठा होगा सहसा ही अपने मन के विस्थापन से.
प्रियंगु जो कि कालिदास की पत्नी हो चुकी थी, अपने प्रतिहारियों के साथ मल्लिका को मिलने आती है....वो उसे नाना प्रलोभन देती है...यथा अपने साथ कश्मीर ले जाने का, पुराने घर का परिसंस्कार करने का. किंतु यहाँ मल्लिका का प्रणय अडिग रहा. वो हिला-डुला नहीं. लिप्सा से नहीं भावना से अनुराग था मल्लिका को....वो ये भावनाएं बचाना चाहती थी.
कश्मीर शासक की मृत्यु के उपरांत कालिदास यकायक राज्य से विरक्त हो गये. कश्मीर से लौट आये. लेकिन कहाँ गये, किसी को ठीक ठीक पता नहीं था. किसी ने कह दिया संन्यास ले लिया है...यह विरक्ति की पराकाष्ठा थी.
वो लौट कर उसी मल्लिका की देहरी आये जो उनकी शैशव-संगिनी थी. ये भावुक कर देने वाले क्षण थे. कालिदास को उज्जयिनी जाकर प्रियंगु से विवाह कर लेने, बिना मिले कश्मीर चले जाने का अपराध-बोध साल रहा था. यह ग्लानि अपनी इस प्रेम-उपत्यका के समक्ष क्षमाशिला सी नतनयन हो गयी.
कालिदास कहने लगे.....
मैं राजधानी गया लेकिन यहीं का बना रहा. वहां जाकर जो लिखा, यहीं का जीवन संचय है.
"कुमार-सम्भवम्" का हिमालय यही है और तपस्विनी उमा तुम हो, मल्लिका !
मेघदूत के यक्ष की पीड़ा मेरी है और विरह-विर्मदिता यक्षिणी तुम हो !
अभिज्ञान-शाकुन्तलम् में तुम्हीं का रूप मेरे सामने था.
रघुवंश में अज का विलाप मेरी ही वेदना की अभिव्यक्ति था.....
मल्लिका कालिदास कुछ पन्ने थमाती है...कहती है- मैंने यह आपके लिए बचाये रखे थे..आप इन धवल पन्नों पे नव-सर्जन करना.
कालिदास कहते हैं-
ये पन्नें जो वर्षा की बूंदों से गीले हुए हैं...दरअसल ये तुम्हारे आंसू हैं...जो वियोग-मेघ से झरे हैं.
स्वेद-कणों से ये मैले हुए हैं.
पन्ने-पन्ने पे सुखी हुई पत्तियों की सुगन्ध शेष है.
क्या कहती हो ? इस पर रचना करूँ ?
इस पर एक महाकाव्य की रचना पहले ही हो चुकी है...अनंत सर्गों का महाकाव्य !!
दोनों संवाद में संलिप्त होते हैं, अपने भूत में खोये होते हैं....कि मदिरा पीये हुए विलोम का प्रवेश होता है.
तभी बच्ची के रुदन का कोमल रव मल्लिका को भीतर खींचता जाता है...
कालिदास कहता है...ये बच्ची कौन है ?
मल्लिका कहती है- यह मेरा वर्तमान है.
विलोम संग परिणय में बँध चुकी थी कालिदास की प्रेयसी....यह अनंतायामी कथा यहीं समाप्त होती है...कभी पूरी न होने की दिशा में...
कालिदास मल्लिका की कुटिया से पलायन करते जाते हैं...
--प्रवीण मकवाणा
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कालिदास मेरी चेतना में समाविष्ट प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक हैं. उनके वाङ्मय से गुजरना जैसे तप्त मौसम में किसी पानीदार लता से आलिंगन करना होता है. उनके कृतित्व-व्यक्तित्व पर लिखा अक्षर-अक्षर मेरी स्मृति-कोश का अमूल्य मौक्तिक है. मैं उसे प्रलय की स्थिति में भी सहेजना चाहूँगा !
आज़ मोहन राकेश की कृति "आषाढ़ का एक दिन" पढ़ी. मोहन राकेश मेरे प्रिय कथाकारों में से हैं. वो एक निर्झर की तरह बहते जाते हैं...उनका लेखन मुझे सम्मोहित करता है.
आज़ का अवसर मेरे दो प्रिय कथाकारों के मिलन का था...सो मन रमता ही गया.
कालिदास और मल्लिका ग्राम-प्रांतर के हतीतिमाच्छादित पहाड़ों में विचरते हुए मेघ-मालाओं को निहारते और उसमें कहीं अपनी प्रतिच्छाया देखने की स्नेहसिक्त चेष्टा करते. मल्लिका के कोमल मन-आँगन की भाव-लताओं का स्पर्श कालिदास के काव्य में उतरता और आषाढ़ मास की बारिश बनकर धरा पर बरस पड़ता तो दोनों प्रेमी-मनों के साथ-साथ समस्त प्राणिजगत आह्लादित हो जाता.
कालिदास की नियति में कुछ समय का राजयोग था. यह "नियति" ग्राम से राजधानी उज्जयिनी पलायन लेकर आयी. और साथ ले आयी, गुप्त राजदुहिता प्रियंगुमञ्जरी के साथ परिणय और कश्मीर का सिंहासन !
कालिदास यह राजकवि का सम्मान नहीं चाहते थे. लेकिन जगदम्बा के मंदिर जाकर मल्लिका ने ही उन्हें इस प्रस्ताव के लिए मनाया था. इस तरह कालिदास उनसे बिछड़ गये थे.
वो मन जो हरिणशावक की केलियों में रमा करता था...आज़ तड़प उठा होगा सहसा ही अपने मन के विस्थापन से.
प्रियंगु जो कि कालिदास की पत्नी हो चुकी थी, अपने प्रतिहारियों के साथ मल्लिका को मिलने आती है....वो उसे नाना प्रलोभन देती है...यथा अपने साथ कश्मीर ले जाने का, पुराने घर का परिसंस्कार करने का. किंतु यहाँ मल्लिका का प्रणय अडिग रहा. वो हिला-डुला नहीं. लिप्सा से नहीं भावना से अनुराग था मल्लिका को....वो ये भावनाएं बचाना चाहती थी.
कश्मीर शासक की मृत्यु के उपरांत कालिदास यकायक राज्य से विरक्त हो गये. कश्मीर से लौट आये. लेकिन कहाँ गये, किसी को ठीक ठीक पता नहीं था. किसी ने कह दिया संन्यास ले लिया है...यह विरक्ति की पराकाष्ठा थी.
वो लौट कर उसी मल्लिका की देहरी आये जो उनकी शैशव-संगिनी थी. ये भावुक कर देने वाले क्षण थे. कालिदास को उज्जयिनी जाकर प्रियंगु से विवाह कर लेने, बिना मिले कश्मीर चले जाने का अपराध-बोध साल रहा था. यह ग्लानि अपनी इस प्रेम-उपत्यका के समक्ष क्षमाशिला सी नतनयन हो गयी.
कालिदास कहने लगे.....
मैं राजधानी गया लेकिन यहीं का बना रहा. वहां जाकर जो लिखा, यहीं का जीवन संचय है.
"कुमार-सम्भवम्" का हिमालय यही है और तपस्विनी उमा तुम हो, मल्लिका !
मेघदूत के यक्ष की पीड़ा मेरी है और विरह-विर्मदिता यक्षिणी तुम हो !
अभिज्ञान-शाकुन्तलम् में तुम्हीं का रूप मेरे सामने था.
रघुवंश में अज का विलाप मेरी ही वेदना की अभिव्यक्ति था.....
मल्लिका कालिदास कुछ पन्ने थमाती है...कहती है- मैंने यह आपके लिए बचाये रखे थे..आप इन धवल पन्नों पे नव-सर्जन करना.
कालिदास कहते हैं-
ये पन्नें जो वर्षा की बूंदों से गीले हुए हैं...दरअसल ये तुम्हारे आंसू हैं...जो वियोग-मेघ से झरे हैं.
स्वेद-कणों से ये मैले हुए हैं.
पन्ने-पन्ने पे सुखी हुई पत्तियों की सुगन्ध शेष है.
क्या कहती हो ? इस पर रचना करूँ ?
इस पर एक महाकाव्य की रचना पहले ही हो चुकी है...अनंत सर्गों का महाकाव्य !!
दोनों संवाद में संलिप्त होते हैं, अपने भूत में खोये होते हैं....कि मदिरा पीये हुए विलोम का प्रवेश होता है.
तभी बच्ची के रुदन का कोमल रव मल्लिका को भीतर खींचता जाता है...
कालिदास कहता है...ये बच्ची कौन है ?
मल्लिका कहती है- यह मेरा वर्तमान है.
विलोम संग परिणय में बँध चुकी थी कालिदास की प्रेयसी....यह अनंतायामी कथा यहीं समाप्त होती है...कभी पूरी न होने की दिशा में...
कालिदास मल्लिका की कुटिया से पलायन करते जाते हैं...
--प्रवीण मकवाणा
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