विसर्जन
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जोगिन ! निदाघ छूटता जा रहा; आषाढ़ के
धवल पखवाड़े में 
पावस का प्रथम स्पर्श पाने को उत्कंठित धरा 
मघा नगतर के साथ घुल रही 
रीतने की अनगिन व्यथा। तुम कहाँ हो ? 


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