महाप्राण का आत्मजा-अनुराग

पुत्री, प्रकृति का अनुपम उपहार .... पिता के अन्तस् की चित्रमयी अभिव्यक्ति ... जिसका पतिगृह जाना भी वज्र-हृदय पिघला दे फिर सरोज तो देवलोकवासिनी हो गयी थी... उसकी निष्प्राण देह देख महाप्राण कवि की चेतना जड़ हो गयी. उसकी चीत्कार सुन स्वयं नभमंडल रोने लगा. रूदन जब कविता में उतरा तो विश्व का विश्रुत शोक गीत बन पड़ा. जिसे पढ़कर कइयों ने अश्रुजल से अपने प्रिय का तर्पण किया, कइयों ने स्वयं को ढांढस बंधाया.
" सरोज-स्मृति " में निराला का सम्पूर्ण संवेदनसिक्त हृदय खुल आया है... यहाँ भावनाओं के तटबन्ध टूटे..स्मृतियों के धारे निकल पड़े... आँखों में एक छवि विशेष की आभा आलोक भरती रही, भुजाएं उसे आलिंगन में भरने के लिए कसमसाने लगीं...
कवि, पुत्री जन्म पर अबोध से बोध पाता है...
"अशब्द अधरों का सुना भाष,
मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश
मैंने कुछ, अहरह रह निर्भर
ज्योतिस्तरणा के चरणों पर। "
लेकिन उस शाश्वत प्रेरणा का छोड़ जाना कवि को भीतर से झकझोर देता है.
"जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर
छोड़ कर पिता को पृथ्वी पर
तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --
"जब पिता करेंगे मार्ग पार
यह,अक्षम अति,तब मैं सक्षम,
तारूँगी कर गह दुस्तर तम ? "
निराला के पास शब्द थे, अर्थ नहीं. अर्थ का अभाव उन्हें सालता था. वो अपनी आत्मजा हित कुछ न कर पाये.. रोटी-कपड़ा-मकान की आवश्यकता-त्रय तक का न होना कितना दुःखद..निराला ने अपनी हार स्वीकार की... इसका प्रायश्चित उन्हें शब्दों से करना पड़ा...
" धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित न कर सका!
जाना तो अर्थागमोपाय,
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ-समर।
शुचिते, पहनाकर चीनांशुक
रख सका न तुझे अत: दधिमुख।
क्षीण का न छीना कभी अन्न,
मैं लख न सका वे दृग विपन्न;
अपने आँसुओं अत: बिम्बित
देखे हैं अपने ही मुख-चित। "
सरोज के बचपन की स्मृति निराला का प्राणाधार है. वह सवा साल की बालिका अपनी माँ को पहचानने ही लगी थी कि माँ उसे हमेशा के लिए छोड़ गयी....सुकोमल चुम्बनों से आर्द्र चेहरा, भ्रात सङ्ग खेलना-कूदना, नानी-गेह गमन...
" तू सवा साल की जब कोमल
पहचान रही ज्ञान में चपल
माँ का मुख, हो चुम्बित क्षण-क्षण
भरती जीवन में नव जीवन,
वह चरित पूर्ण कर गई चली
तू नानी की गोद जा पली।
सब किये वहीं कौतुक-विनोद
उस घर निशि-वासर भरे मोद;
खाई भाई की मार, विकल
रोई उत्पल-दल-दृग-छलछल ! "
मुझे यहाँ शमशेर बहादुर सिंह की एक उक्ति स्मरण आती है. वो कहते हैं " कला के संघर्ष व्यक्ति संघर्ष से विलग नहीं होते. "
निराला अपने काव्य-क्षेत्र के संघर्ष याद करते हैं...वो मुक्त छंद का प्रणयन कर रहे थे. यह बात शास्त्रीय-कवियों को कैसे रुचती, नवोन्मेष परम्परा को खटकता है...उनकी कई कविताएँ सम्पादकों के द्वार से वापस लौट रहीं थीं... वे निराशा में आकंठ डूबे हुए थे. लिखते हैं -
"लिखता अबाध-गति मुक्त छंद,
पर संपादकगण निरानंद
वापस कर देते पढ़ सत्त्वर
दे एक-पंक्ति-दो में उत्तर
लौटी लेकर रचना उदास
ताकता हुआ मैं दिशाकाश ! "
निराला लोक से सम्पृक्त कवि थे. उनका लोक कविताओं में उतर कर मानव के लघुतम की प्रतिष्ठा करता है. वे बातें जो हमारे घरों में अक़्सर होतीं हैं, निराला सरोज के विवाह संबंधित लोक-कहन को काव्य में प्रस्तुत करते हैं -
" इससे पहिले आत्मीय स्वजन
सस्नेह कह चुके थे जीवन
सुखमय होगा, विवाह कर लो
जो पढी़ लिखी हो -- सुन्दर हो। "
निराला अपने हाथों से अपनी पुत्री का बाल्य से तारुण्य में प्रवेश करा रहे हैं... कौन बाप चाहता है कि उसकी बिटिया बड़ी हो जाए. उसकी चाह अपनी बेटी को हमेशा बाल्य रखने की होती है. कितनी सारी आशंकाएं-दुश्चिंताएं एक बाप को घेरने लगतीं हैं... लेकिन निराला विवश हैं..एक पिता अपनी पुत्री का यौवन लिख रहा है...यहां कविता की गति के लिए आवश्यक है..यह निराला ने भारी मन से लिखा होगा कि -
" धीरे-धीरे फिर बढा़ चरण,
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारुण्य सुघर
आईं, लावण्य-भार थर-थर
काँपा कोमलता पर सस्वर
ज्यौं मालकौस नव वीणा पर,
नैश स्वप्न ज्यों तू मंद मंद
फूटी उषा जागरण छंद
काँपी भर निज आलोक-भार,
काँपा वन, काँपा दिक् प्रसार। "
एक समय आया जब निराला की सास ने कहा कि आप इसे अपने निज-गृह ले जाएं... सुयोग्य किसी वर से इसका पाणिग्रहण कराएं... लड़की का बड़ा होना और स्वजन की चिंता, यहाँ मुखर हो पड़ी है -
"सासु ने कहा लख एक दिवस :--
"भैया अब नहीं हमारा बस,
पालना-पोसना रहा काम,
देना 'सरोज' को धन्य-धाम,
शुचि वर के कर, कुलीन लखकर,
है काम तुम्हारा धर्मोत्तर;
अब कुछ दिन इसे साथ लेकर
अपने घर रहो, ढूंढकर वर
जो योग्य तुम्हारे, करो ब्याह
होंगे सहाय हम सहोत्साह।"
अकेला पिता अपनी पुत्री के लिए वर की खोज में निकलता है. वह कान्यकुब्ज ब्राह्मण होकर भी उनकी रूढ़ियों-परम्पराओं से चिढ़ता है। . उसे बरात और दहेज का खर्चा व्यर्थ जान पड़ता है... वो स्त्री मन को सदैव अस्वीकार पति-शिव से गिरिजा विवाह का प्रतिमान रख अपनी वेदना व्यक्त करते हैं -
"वे जो यमुना के-से कछार
पद फटे बिवाई के, उधार
खाये के मुख ज्यों पिये तेल
चमरौधे जूते से सकेल
निकले, जी लेते, घोर-गंध,
उन चरणों को मैं यथा अंध,
कल ध्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऐसी नहीं शक्ति।
ऐसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह!"
यदि महाजनों को तो विवाह
कर सकता हूँ, पर नहीं चाह
मेरी ऐसी, दहेज देकर
मैं मूर्ख बनूं यह नहीं सुघर,
बारात बुला कर मिथ्या व्यय
मैं करूँ नहीं ऐसा सुसमय।
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम,
लग्न के; पढूंगा स्वयं मंत्र
यदि पंडितजी होंगे स्वतन्त्र।
जो कुछ मेरे, वह कन्या का,
निश्चय समझो, कुल धन्या का।"
अब विवाह होता है.... सरोज के विवाह सम्बद्ध सारे क्रिया-कलाप स्वयं निराला करते हैं... हाय ! कितना मजबूर पिता ?
यहाँ निराला सरोज की पुलकित देह के अङ्ग-प्रत्यङ्ग का सुंदर चित्र खींचते हैं... निराला अपनी आत्मजा को अपने वसन्त का प्रथम गीत कहते हैं...
" देखा विवाह आमूल नवल,
तुझ पर शुभ पडा़ कलश का जल
देखती मुझे तू हँसी मन्द,
होंठो में बिजली फँसी स्पन्द
उर में भर झूली छवि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रृंगार-मुखर
तू खुली एक उच्छवास संग,
विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग,
नत नयनों से आलोक उतर
काँपा अधरों पर थर-थर-थर।
देखा मैनें वह मूर्ति-धीति
मेरे वसन्त की प्रथम गीति "
एक चित्र में दूसरा चित्र स्वयमेव दीख पड़ता है... अपनी पुत्री का पाणिग्रहण संस्कार...निराला को सहसा ही अपने विवाह का स्मरण आ जाता है... उनके मानस पटल पर अपनी स्वर्गीया प्रिया की छवि जीवंत हो उठती है और वो लिखते हैं -
" श्रृंगार, रहा जो निराकार,
रस कविता में उच्छ्वसित-धार
गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग --
भरता प्राणों में राग-रंग,
रति-रूप प्राप्त कर रहा वही,
आकाश बदल कर बना मही। "
कोई प्रियजन आमन्त्रित नहीं थे. सर्वथा सादा विवाह ....
हो गया ब्याह आत्मीय स्वजन
कोई थे नहीं, न आमन्त्रण
एक पिता क्या नहीं कर रहा... अपनी बेटी की सेज स्वयं सजा रहा... संस्कारों की वेदिका पर चढ़कर निराला कहते हैं -
" माँ की कुल शिक्षा मैंने दी,
पुष्प-सेज तेरी स्वयं रची "
यहाँ निराला कण्व ऋषि के आश्रम से पति-गृह गमन करती शकुंतला का उल्लेख करते हैं..... एक बार वह अपनी बेटी को शकुंतला का उपमान दे देते हैं लेकिन तनिक विचार कर अपने शब्द वापस लेते हैं... कवि द्वन्दों से पूरित होता है... वह घढ़ता-तोड़ता है. शकुंतला की भी माँ नहीं थी और सरोज की भी नहीं है... लेकिन दोनों की स्थितियां परस्पर भिन्न हैं.. उसकी माँ छोड़कर अपनी इच्छा से गयी और सरोज की माँ असमय काल का ग्रास बनी. कवि व्यथित हो लिखता है -
सोचा मन में, ’’वह शकुंतला,
पर पाठ अन्य यह, अन्य कला।’’
सरोज कुछ दिन पितृ-गेह रहकर फिर अपने ननिहाल चली जाती है... नानी और मामा-मामी के प्यार से सराबोर... निराला कहते हैं यहीं की वह लता ( सरोज की माँ ) थी, सरोज जिसकी एक कली है... अंततः एक दिन सरोज इस जग को छोड़ जाती है-
कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद,
बैठी नानी की स्नेह-गोद।
मामा-मामी का रहा प्यार,
भर जल्द धरा को ज्यों अपार,
वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त,
तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त,
वह लता वहीं की, जहाँ कली
तू खिली, स्नेह से हिली, पली,
अंत भी उसी गोद में शरण
ली, मूँदे दृग वर महामरण!
जिसने क्रमशः अपने स्वजन खोये हों... जिसके सारे संबल असमय छीन लिए गये हों, उसका हाहाकार अपनी बेटी के मौत पर अस्वाभाविक नहीं है. निराला की लेखनी रो पड़ी...शब्दों में चीत्कार समाहित हो गयी... अर्थों ने पलायन कर दिया... कवि के भीतर का व्यथा-भोगी चिल्ला उठा... कितना भयावह क्रंदन ....एक अंतिम संबल का चिर-बिछोह ....
" मुझ भाग्यहीन की तू संबल
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!
हो इसी कर्म पर वज्रपाल
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मों का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण! "
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-- प्रवीण मकवाणा 

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