कविता " शकुंतला की प्रसव पीड़ा "
शकुंतला की प्रसव-पीड़ा
उजाड़ आँखों के आसपास
सूखे आंसुओं की पपड़ी जमी थी
सारा आकर्षण इसी तरह ठहरा हुआ था
पट्टी बाँधे पाँव भारी थे
हस्तरेखाएं स्पष्ट नहीं दिखतीं थीं
काँटें बीनने वाले हाथों में
भाग्य रूठ जाने के अनगिन चिह्न थे
बैलगाड़ी के पहिये सा धरती में धँसता जाता
उसकी आशाओं का महल
वह बिता रही थी
यौवन में वनवास
वह पाल रही थी गर्भ में
तिरस्कृत-प्रणय
उसके चित्त में समायी चिंताएं
बढ़ते उदर के साथ बढ़तीं जातीं ...
वह सोचती कि असह्य पीड़ा
मुझे किसी दिन छोड़ेगी दुष्यंत की तरह
लकड़ियों की गठरी उतार
वह बेसुध हुई, खटिया पुलक उठी
आख़िर एक दिन
प्रेम-पतझर ढोकर
शकुंतला ने जना आर्यावर्त का वैभव
-- प्रवीण मकवाणा
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