हम मर रहे हैं
हमारा समाज मर रहा है
'सभ्य' शब्द अस्तित्व से जूझ रहा है
"यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता" जैसे आप्त वचनों पर
कालिख़ पुती जा रही है
"मातृवत् परदारेषु" जैसे महद् कथनों पर थूका जा रहा है
हम मानव से पत्थर बन रहे हैं
हम चेतन से जड़ की ओर लौट रहे हैं
यह व्यतिक्रम हमारी बुद्धि का पलायन नहीं है मात्र
यह हमारी आत्मा की मृत्यु की घोषणा है !

बलात्कार खुलेआम दिन-दहाड़े
भेड़ियों की टोली नोच रही हैं
मातृत्व का आँचल
ये नराधम अपनी कलुषित साँसें बलात् घुसेड़ रहे हैं
उस महिला के मुंह में
जिसने इस संसार तक को साँसें सौंपी हैं !
ये हैवान, राक्षस मानव खाल में
क्यों समझते नहीं एक छोटी बात
कि उनके अपने घर में भी होगी माँ-बहन-बेटी !

पर हमें कहाँ कोई फ़र्क़ पड़ रहा ?
अब हमें ये ख़बरें उद्वेलित नहीं करतीं
हमारा विवेक कांग्रेस-बीजेपी की चौखट पर गिरवी पड़ा है
हमारी बुद्धि को मीडिया द्वारा रोज़ दिखाये जा रहे
चुनावी विश्लेषणों, एक्जिट पोल्स ने हर लिया है
अख़बारों ने हमारी आँखों का पानी विषैला कर दिया है
हमारे भीतर का राम नारों में बदल गया है !

मुझे कुछ नहीं कहना तुम लोगों से
हाँ ईश्वर तुमसे एक बात कहनी है
या तो इंसानों को इंसान बनाकर भेज
या फ़िर मेरी आँखों की रौशनी ख़त्म कर दे,
कानों में गर्म सीसा डाल दे
अब नहीं देखा जाता, नहीं सुना जाता !

हे माताओ ! बहनो ! बेटियो !
हम शर्मिंदा हैं ऐसा नहीं कहूँगा
मैं कहना चाहता हूँ - हम मर गये हैं
मर्दानगी अब गाली है सभ्यता के पृष्ठ पर लिखी हुई !

◆ प्रवीण मकवाणा

बहन प्रियंका रेड्डी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि 😢😢😢

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