वो ज़मीं है
उसने थाम रखा है मेरा आसमान
मेरे सितारों से चमकता है
उसका सुनहरा आँचल !
वो मेरे साथ चलती है
परछाई की तरह
मैं उसकी बातों में घुलता हूँ
जैसे घुलती है चाय में शक्कर !
वो चूमती है पागल की तरह
मुझे एक बच्चा समझकर
और मैं उसे बाहों में भर लेता हूँ !
उसका होना मुझे पूरा करता है
भरता है
मेरी भावनाओं के रीते घट !
मैं बेपरवाह सा
उसकी गोद में लेट जाता हूँ
सुस्ताता हूँ, अलसाता हूँ
वो मेरे बालों से खेलती है
एक-एक बाल को अलग अलग करती है
वो मेरे माथे पर आये बाल हटाती है
और गोरी ललाट पर रख देती है
अपने कोमल होंठ
मैं सिमट लेता हूँ खुद को खुद में
वो मुझे खोलती है खिड़की सा !
वो फूल की पंखुड़ी सी
छूकर रसमय कर देती है मुझे
मैंने उसको गले पर कई कई बार चूमा है.
उसकी आँखें बोलतीं हैं
और मेरी कलम !
वो मेरी आँखों में
झिलमिलाती है
सपना बनकर
वो वर्तमान को जीते जीते
जब भविष्य को भाँपती है
तो एकाएक कुछ सोचने के लिए रुक जाती है
मैं उसे भविष्य लगने लगता हूँ कई बार !
वो लड़की है, मैं लड़का हूँ
हम दो अलग-अलग ज़िस्म हैं
बस यही फ़र्क़ है,
वरना हम दोनों की आत्मा एक ही है.
उसने थाम रखा है मेरा आसमान
मेरे सितारों से चमकता है
उसका सुनहरा आँचल !
परछाई की तरह
मैं उसकी बातों में घुलता हूँ
जैसे घुलती है चाय में शक्कर !
मुझे एक बच्चा समझकर
और मैं उसे बाहों में भर लेता हूँ !
भरता है
मेरी भावनाओं के रीते घट !
उसकी गोद में लेट जाता हूँ
सुस्ताता हूँ, अलसाता हूँ
वो मेरे बालों से खेलती है
एक-एक बाल को अलग अलग करती है
और गोरी ललाट पर रख देती है
अपने कोमल होंठ
मैं सिमट लेता हूँ खुद को खुद में
वो मुझे खोलती है खिड़की सा !
छूकर रसमय कर देती है मुझे
मैंने उसको गले पर कई कई बार चूमा है.
और मेरी कलम !
झिलमिलाती है
सपना बनकर
जब भविष्य को भाँपती है
तो एकाएक कुछ सोचने के लिए रुक जाती है
मैं उसे भविष्य लगने लगता हूँ कई बार !
हम दो अलग-अलग ज़िस्म हैं
बस यही फ़र्क़ है,
वरना हम दोनों की आत्मा एक ही है.
◆ प्रवीण मकवाणा
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