हे लड़की ! अप्सरा सा सौंदर्य तुम्हारा

तुम लड़की हो या अप्सरा कोई .....

तुम्हारी काया की चिक्कण रति रूप को लज्जित करे..तुम्हारा कायिक रचाव अन्यतम, भुवन-भास्वर भी नत हो जाए....गात का अनुपम संघात, एक चित्ताकर्षक दैवीय अनुष्ठान...

तुम तीनों रूपों में प्रिय हो मुझे... नारी, महिला और स्त्री ! प्रथम दो में असीम आदर है, सनातन निष्ठा है..मुझे तो तुम्हारा तीसरा रूप रुचता है - स्त्री !

स्त्री में ‘स्त्यै’ है. अर्थात् लज्जा से सिकुड़ना. सूत्र कहता है- ‘लज्जार्थस्य लज्जन्तेपि हि ता:’ ....सलज्ज सौंदर्य !

स्त्री - स्तन केशवती स्त्री ! पाणिनि ऐसा कहते हैं.

तुम सद्यस्नाता जैसे पावस ऋतु की बदली.. जो स्पर्श मात्र से तरलायित हो जाए. छूने भर से बिखर जाने की सम्भावना... कितना कोमलांग-वैभव !

कुंतल-राशि ...विटप-वल्लरी सी. अश्वत्थ जैसी शीतल छाँव... मेरी श्रद्धा, मेरा अन्तस् आश्रय-स्थल.

नयन ... राजस्थानी-लोक जिसे मिरगानैणी कहता है. पलकों का अवगुंठन और पुतलियों का चञ्चला नर्तन...लास्यमयी लोचन-संसार.. तीक्ष्ण दृष्टि...सीधे उर-भेदन की क्षमता.

नासिका कीर सी... दाड़िम सी दंत-पंक्ति ..क्षीण-कटि पर दंतक्षतों की नीलकुसुम-माला कभी जो अंकित हो जाए.. आह्ह ..क्या स्वर्गीय आनंद.

कपोल-लाल गुलाबी ...कानों पर बालों का घेरा.. बाली की चमक से दीप्त एक द्वीप जैसे.. .. अलक-पलक उत्थान-पतन ... चेहरा जैसे चक्रव्यूह.. अधरों पर विस्फारित मृदु हास, जैसे धरा के आँचल में बिखर गयीं हों पुष्प-पंखुरियाँ .... जमुना नदी का सा डेल्टा पड़ता है होंठों के बीच, जहाँ फिरती हुई जिव्हा कुछ क्षण ठहरती है.... उस कटाव पर थमी है साँसों की सम्पूर्ण रफ़्तार !

अधरों में तुम्हारे घुली है शहद सी मिठास... यह लावण्य है- ज्यूँ ज्यूँ पिए कोई प्यासा मरे ...

तुम्हारे वक्ष में उतर आयी है चन्द्र की सम्पूर्ण ज्योत्स्ना.... शीतलता, मादकता सब !
उन्नत ललाट सम स्कंध में कसावट.... स्कंध से वक्ष-स्थल तक की फिसलन, तौबा !

अंशुक-स्पर्श से सहमी हुई लता सी कोमल बाँह... गौरवर्णी... बाँह में सिमटने वाले की साँसें उलझती अवश्य होंगी....वह बड़भागी होगा जिसके शयन को ऐसा तकिया नसीब होता है.

हे कामकला-निपुणा ! तुम्हारा नाभि-देश चम्पकहेमवर्ण है. चंचा श्वेत और हेम पीताभ होता है.. श्वेतिमा और पीतिमा के मिश्रण से एक सम्मोहक कांति उत्पन्न होती है... नाभिस्थल चम्पा के फूल सा है. गहराव-ठहराव !

रतिसुखाकांक्षिणी आलिंगन को सद्य उत्प्रेरित करने वाला तन लेकर बैठी है... प्रीति-वचन सुनने को आतुर कान क्लांत हो कई बार सोकर जगते हैं.

चलन में मृग सी ...चौकड़ी भरती जाती है. पीछे मुड़कर जो देख ले तो प्रकृति के सञ्चालन-क्रम भंग हो जाता है.. उसका प्रवाह अनुपम !
धरा पर पड़ते पाँव से किंकिण-क्वणन उच्चरता है, अलिगुंजित पद्मों की किंकिण सा...मन का व्यामोह रुक जाता है. हृदय में तरल सा कुछ उतर आता है. अंग-प्रत्यंग में भर आतीं हैं अनंत तरंग.....

चितवन से अभिराम मुक्ताहल बिछा देने वाली मैं तुम्हारा सौंदर्य क्या लिख पाऊँगा... बस इतना ही...पर्याप्त है.

◆ प्रवीण मकवाणा

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