गांधी जी के प्रति .....

गांधी को समझने एवं स्वीकारने में बड़ी बाधा है - अस्मितावाद और दर्शन का द्वैत ! अस्मितावादियों को गांधी के दर्शन से सदैव ख़तरा बना रहता है। वे सोचते हैं गांधी को अपनाने से समाज निर्बल बनता है। यही समस्या अम्बेडकर की गांधी से असहमति के मूल में है। वस्तुतः गांधी समाज को मजबूत बनाते हैं। 

हिंदुओं का एक बड़ा तबक़ा इसी अस्मितावाद के चक्कर में गांधी को गरियाता घूमता है। उनकी स्थूल दृष्टि गांधीवाद के सूक्ष्म मूल्यों को पकड़ पाने में प्रायः निष्फल हुई है। गांधी के सद्गुण यदि तत्कालीन विकृति थे, तब भी उनका चरित कलुष क्योंकर हुआ ? क्योंकि उक्त विकृति समाज सापेक्ष थी, व्यष्टि सापेक्ष नहीं। 

सत्य और अहिंसा का सर्वप्रथम प्रवर्तन गांधी ने नहीं किया, यह भारत के वैदिक मूल्य हैं। सत्य एवं अहिंसा गांधी का नहीं अपितु भारतीय लोक का सनातन अनुशीलन है। यह बात स्वयं गांधी कहते हैं। यदि वो इस पथ के राही हैं तो वह तो सच्चे मायनों में सनातनी हुए।  

मैं गांधी का अस्वीकार भी उन्हीं की असहमति को आदर देने की परंपरा-परिधि में रखने का पक्षपाती हूँ। गांधी राष्ट्रीय नेता थे या नहीं, यह मैं नहीं जानता; लेकिन वह राष्ट्रीय संत जरूर थे। 

#गांधी_जयंती  #सादर_नमन 

 ◆ प्रवीण मकवाणा

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