ग़ज़ल

विश्व की सब चेतना क्यों सो रही है
खून के आँसू धरा जब रो रही है !!

तारिकाएं ही तमस फैला रहीं हैं
व्योम की आलोचना क्यों हो रही है ??

अनवरत विस्तार बढ़ता जा रहा है
प्रीत अपनी थाह लेकिन खो रही है !!

चिर उनींदा पेड़ के मानस पटल पर
वायु मिथ्या धारणाएं बो रही है !!

हो रहे हैं राज्य हित निश्चेष्ट माधव
चीर की चिंता भला किसको रही है ??

नत नयन होकर खड़ा है न्याय भू का
नीति भी वैधव्य निर्मम ढो रही है !!

वेदना के घट सभी रीते पड़े हैं
कौन सुधि मेरे दृगों को धो रही है !!

◆ प्रवीण मकवाणा

Comments

  1. अति उत्तम 👌👌👌👌🌹🌹🌹😍

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  2. शानदार, उत्तम, श्रष्ठ

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  3. प्रवीण - लेखन क़ाबिले- तारीफ़ है ।गद्य और पद्य पर समान अधिकार सशक्त ग़ज़ल हेतु बधाई !

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  4. Unknwn लिखा हुआ आ गया । पता करो , यह टिप्पणी किसकी है ?

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