पीड़ाओं की प्रतिध्वनियां ( मेरी डायरी )

समय अपनी गति से चलता जाता है और मैं यथास्थान जड़वत खड़ा हूँ जैसे बालू में धँसा रथ-चक्र ! 

पावस आयी, अब जाने को है। हरीतिमा खिली, सब मार्ग धुले। नहीं धुल पाया तो एक कषाय मन। जिसका कि कभी मौसम नहीं बदलता। मैं विगत को पकड़ने की चाह में हाथ बढ़ाता हूँ तो वह बिजली सा कौंध पीछे हो लेता है। मेरा अतीत-मोह है कि छूटता ही नहीं। 

कुछ अभिलाषाएं विटप-वल्लरी पर से फिसलती बूंदों की तरह होतीं हैं; पर्ण पर ठहरतीं नहीं, लेकिन उसे आर्द्र कर जातीं हैं। उफ्फ़ यह पानीदार प्यास ...... 

सोचता हूँ - जब प्राप्य था तो मैं उसे साधारण समझता रहा। अब जब उसका सामीप्य नहीं है तो उसकी महत्ता कितने हजार गुणा बढ़ गयी है। वो स्यात ही विश्वास करे। एक अपराध जो भीतर से खाये जा रहा है-- मैं ढो रहा हूँ। 

बेटे की बाट जोहती माँ की एक जोड़ी थकी आंखों सा हूं मैं ! दर्शन-हीन, रुदन निरन्तर और अनवरत विकलता। 

◆प्रवीण मकवाणा

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