थळ कांता
निरंजना सी लड़की निहारती रहती खेजड़ी की समाधिलीन शाखें
उसकी पनीली आँखों में तैरता था मरुथल
और कुंतलों में लहराती निस्तब्धता
वो उजले धुल-कणों में
ढूंढती फिरती प्यार का स्पर्श
ग्वालों से पूछती अपने प्रेमी का पता
पशुओं के पग-चिह्नों को बैठ दुलारती
गोबर की सुवास से अपना मार्ग बदलती
सांवली लड़की तप्त-हवाओं के कानों में कुछ बतियाती
आवणकी के फूलों से किंचित् मन बहलाती,
फिर लू के पीठ पर सवार हो चल पड़ती
यह ऊंटों वाला देस, यहाँ
धँसते पाँवों में समाता यात्रा का अथक साहस
सूखते कंठ में घुलती अपार अभीप्सा
और अवसन्न आत्मा को मिलता असीम आकाश का आसरा
वो कभी थकती नहीं
वो कभी रूकती नहीं
प्रेम की और थळ-कांताओं की एक ही रीति है.
◆ प्रवीण मकवाणा
उसकी पनीली आँखों में तैरता था मरुथल
और कुंतलों में लहराती निस्तब्धता
वो उजले धुल-कणों में
ढूंढती फिरती प्यार का स्पर्श
ग्वालों से पूछती अपने प्रेमी का पता
पशुओं के पग-चिह्नों को बैठ दुलारती
गोबर की सुवास से अपना मार्ग बदलती
सांवली लड़की तप्त-हवाओं के कानों में कुछ बतियाती
आवणकी के फूलों से किंचित् मन बहलाती,
फिर लू के पीठ पर सवार हो चल पड़ती
यह ऊंटों वाला देस, यहाँ
धँसते पाँवों में समाता यात्रा का अथक साहस
सूखते कंठ में घुलती अपार अभीप्सा
और अवसन्न आत्मा को मिलता असीम आकाश का आसरा
वो कभी थकती नहीं
वो कभी रूकती नहीं
प्रेम की और थळ-कांताओं की एक ही रीति है.
◆ प्रवीण मकवाणा
वाह😊👍💐
ReplyDeleteआभार सा
Delete👌👌
ReplyDeleteआभार सा
Deleteवाह मज़ा आ गया ...
ReplyDeleteआभार सा
ReplyDeleteWah
ReplyDeleteआभार सा
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