वामियों का दोगलापन

किस आधार पर कह दिया गोपाल संघी है...?
मुझे ज़रा उसकी बस्ती और शाखा की जानकारी दीजिये तो .....

तुम्हारे पास नहीं है.

तुम गोड़से को भी संघी कहते रहे... तुम्हारे माई-बाप राहुल जी उसके लिए माफ़ी भी मांग चुके ..वो भी कोर्ट में.

शरजिल तुम्हारा भाई है और अफज़ल तुम्हारा बाप. देश तोड़ने की बात करने वाला हर आदमी तुम्हारे खानदान का हिस्सा है.

मैं गोपाल के किये का समर्थन नहीं करता... किसी को नहीं करना चाहिए. किसी को कानून हाथ में लेने की छूट नहीं दी जानी चाहिए.... लेकिन वामियों और मुल्लों का दोगलापन देखिये.

सीएए का विरोध करते एक मुल्ले के हाथ में बम फटा था... वो कौन था ? देश का रक्षक ? नहीं.. वह तुम्हारा अल्पसंख्यक भाई था.

कश्मीर में पत्थर फेंकने वाले भटके हुए नौजवान... क्योंकि वो सब अल्लाह-परस्त हैं. चूँकि वे मुसलमान हैं तो तुम्हारे ख़ास हुए... जैसे शादी में जीजाजी-फूफाजी.

रवीश की बकलोली तो अलग ही है... फलाँ के माँ-बाप गरीब हैं. बच्चा पीएचडी कर रहा है. अधिकार के लिए लड़ रहा है. ...कायके अधिकार ? भारत तोड़ने के.

गोपाल को ढाल बनाकर अपना एजेंडा सफल करना है तुम्हें... सम्भव नहीं है कॉमरेड. यह अब नेहरू के चेलों का भारत नहीं रहा...

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अधिपति मुसलमान हैं....क्यों ?? गंगा-जमनी तहज़ीब की ऐसी तैसी.

गाय का माँस खाते हुए गांधी पर किताब लिख रहे हैं और कहते हैं - गांधी आत्मार्पित करने वाले व्यक्तित्व हैं. खुद आगजनी करते हैं..बम फेंकते हैं.. हिंदुओं की क़ब्र खोदने की बात करते हैं और दूसरों को गोड़से कहते घुम रहे हैं.

एक भाई ने तो शाहीन बाग़ में हो रहे धरना-प्रदर्शन की तुलना स्वाधीनता आंदोलन से कर डाली .... किस आधार पर ? बस इस आधार पर कि इनके मैग्सेसे सर को उसमें किरांती दिखती है.

मैं हृदय से चाहता हूँ कि यह सरकार तुम्हारी एक न सुने... खुद का कोई लोकतंत्र नहीं और देश में लोकतंत्र चाहिए तुम्हें...

मैंने पहले कभी कहा था, आज फिर दोहराता हूँ कि भारत गज़वा ए हिंद बनने से रहा ... मुल्लों समेत सब अख़्तर-राहत-मुनव्वर कूद जाएँ तब भी. यदि बन गया तो सेक्युलर-गैंग हलाल होने के लिए तैयार रहे. मज़हब के नाम पर इन्होंने दुनिया में कोई जगह बाकी नहीं रखी जहाँ नरसंहार न किया हो... तुम तो चीज़ ही क्या हो कॉमरेड !

काफ़िरो ! अपना ख़याल खुद रखना.

शेष फिर कभी .....

--प्रवीण मकवाणा

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