मेरी डायरी "आकांक्षा " से .....

मेरी डायरी से

"त्वरा"

कभी कहीं पढ़ा था कि सबसे दुखद क्षण वह होता है जब कोई हमें गले पर चूम रहा हो और हमारे मस्तिष्क में किसी और की स्मृति तैर रही हो! यह कथन उस दिन मेरी अनुभूति हुआ जा रहा था और मैं बेबस असहाय हुआ सब देख रहा था।

तन और आत्मा का यह संघर्षपूर्ण द्वंद मुझे भीतर से खोखला कर रहा था। आज से पूर्व मैंने ऐसा अनुभूत नहीं किया था।  दुनिया की संरचना अजीब है, यहाँ कब कोई किसे बचाने आता है ? मैं प्रतिपल हत हुआ जा रहा था।  मेरी चेतना में चञ्चलता उस समय आई होती तो मैं भाग जाता।  उस वक्त में मौत मांग रहा था लेकिन मयस्सर ना हुई। गर्म सांसों की आवाजाही मेरी आत्मा पर कालुष्य-पेषण कर रही थी।  अनचाही बाहों में जकड़े रहने का दर्द आंखों से आंसू बनकर बह नहीं पाया, बस यह कसर रह गई थी।  कमरे का घुप्प अंधियारा और एक विपरीत लिंगी का सामीप्य, किसी के लिए आमंत्रण हो सकता था मेरे लिए असहज-असह्य स्थिति थी।

हम दोनों अपनी अपनी जगह सही थे। एक को कुलांगना होना था और दूसरे को "रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन न जाई" की तर्ज पर कुल के आदर्शों की पालना करनी थी। 

मोड़ विकेट था ....लेकिन अप्रत्याशित बिल्कुल नहीं ! यहां तक आ जाना महज़ कोई संयोग नहीं था। एक चिर-सिंचित संबंध, जिसमें सिवाय फरेब के कुछ ना था, हमें यहाँ तक ले आया था।

चित्त (दोनों) उद्विग्न, ह्रदय दग्ध... यहां एक अधूरा प्रेम भीतर ही भीतर करवट ले रहा था और उधर अबल-जीवन की असमंजसता थी। दोनों ही पक्ष अशांत थे।

फाल्गुनी मौसम बेरंग ....सब कुछ समाप्त प्राय, शेष कुछ पश्चाताप था बस ..

विलग होना आत्मा से, बदन बंधे होना;  ईश्वर मौत देना पर यह स्थिति मत देना।  बदन बिछते जाते...आग का शमन तो होना ही है. चाह कहां बीच में आती है ?

मेरा उतावलापन उसकी लज्जा एवं आत्मा की अनदेखी -- त्रिवेणी यह दुखद थी, एक कलंक सी !

मेरा-उसका बोध शून्य था !

एक रात कई बार सदियों की यातनाएं लेकर सोती है। रात अकुलाती जाती और चांदनी छितराती जाती .....

 " प्रकृति का उद्दीपन मरी हुई चाहनाओं को प्राणवंत नहीं कर सकता ! "

विगत अधुना के अंतसंघर्ष में भविष्य झूल रहा था। आंखों का प्राच्य-प्रतीच्य खड़े होना अस्वीकार का सबसे बड़ा लक्षण था। घुटन भीतर से छलक कर कमरे में फैल गई। मैं दीवारों पर कुछ मरते सपनों के चित्र देख पा रहा था ....मुझे अपनी शर्ट पर भी दाग नजर आये,  काले धब्बे..!

 मैं उस रात आत्मा को अंधकारमयी कोठी में अकेला छोड़ आया। चेतना विहीन आत्मा भार होती है। मेरी चेतना समष्टिगत संस्कारों के चरणों में दंडवत कर रही थी। उसे आत्मा की उदात्तता से क्या लेना ? आत्मा अधीती होती है चेतना का संस्पर्श पाकर..... मैं उस रात को अपनी जिंदगी से बेदखल कर देना चाहता हूं, पर मैं चाहूं वैसा होता ही कहाँ है ? मैं उस रात की याद को कहीं गाड़ देना चाहता हूं,  पर किस जगह ? हर जगह मेरे प्रेम का अधूरापन पड़ा हुआ है.

" कुछ स्मृतियों का भाग्य सिर्फ संचयन तक होता है, उन्हें आदर नहीं मिलता !"

मैंने कई रातें जागी हैं, लेकिन वह एक रात मैंने काटी थी। मैंने जितना उससे पहले नहीं भोगा होगा, उस एक रात में भोग लिया....  मौत की मुंडेर पर खड़ी होकर जीवन नौका डूबा रही थी वह रात !

मेरा बस चले तो मैं जन्मकुंडली सन्निहित सारे दोष ले लूँ, बस उस एक रात को स्मृति से मिटाने की छूट मुझे मिल जाए।

उंगलियों में घुली हुई प्रताड़नाओं को मुट्ठी में बंद करता-खोलता, अपने बालों में हाथ फेरता, तिजोरी के कांच में खुद को देखता, गुस्सा होता, धिक्कारता स्वयं को...लेकिन अपने चेहरे पर थूक न सका।

" मैं यातना-नगर से निकलने वाली शापित पगडंडी था ! "

सुबह उठा तो संस्कार गीत गा रहे थे, मर्यादा के मुंह पर उदास थी और मैं म्लान-मुख, आत्मा से क्लांत....और उसका हाल होगा एक अनजाने बिंदु सा जिसे वृत्त होने की प्रतीक्षा थी.......

◆ प्रवीण मकवाणा

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