कविता - तुम्हारे काँधे पर का तिल

तुम्हारे काँधे पर का तिल

तुम्हारे काँधे पर का तिल
जैसे निरभ्र नभ में चाँद का दिख जाना !
जैसे दाड़िम का एक दाना रखा हो थाली के मध्य में !
जैसे हिमाच्छादित अद्रि के उत्तुंग शिखर पर बैठी हो कोई गौरेया !
जैसे सुकुमार के कपोल पर लगा दिया हो दिठौना उसकी माँ ने !
जैसे संगमरमर के आँगन बीच उग आया हो कोई गुलाब !
जैसे अक्षि के भीतर की टिमटिमाती,अठखेलियां करती पुतली !
जैसे पुस्तक के धवल पृष्ठ पर लिखा हुआ कालिदास का श्लोक !
जैसे अशोक का अभिलेख खुदा हो किसी प्रस्तर पर !
जैसे बहती हुई सरिता के साथ बहता जाता तृण तरुवर का !
जैसे दूरस्थ क्षितिज में झिलमिलाये बादल का कोई टुकड़ा !

मैं तुम्हारी आत्मा तक
कई बार काया के मार्ग से होता हुआ गया हूँ.
मेरी यात्रा का साक्षी है यह काला तिल...
मेरे क्लांत मानस-पथिक का ठहराव-स्थल !

तुम्हारे आँचल के आस-पास
किसी चोर सा छुपकर बैठा है यह तिल.

यह तिल मेरी सर्जना का उत्स है.
यह महाकाव्य है.
यह सतत् प्रेरणा है.
यह मेरी विजय का प्रतीक है.
यह पीड़ाओं के पारावार के मध्य शांति का टापू है.
यह पलायन के समय मेरा आश्रय-स्थल है.
यह तिल नहीं मेरा दिल है.

◆ प्रवीण मकवाणा 

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