कविताएँ

तीन कविताएँ
1.

ओ अलबेले जोगी !
कौन देश तुम चले गये हो
मुझे अकेला छोड़कर
वेदना की वीथियों में।

ये गलियां, जहाँ कभी तुम
अकारण आ जाते थे
दुनिया से छुप-छुपके
मुट्ठी में थोड़ा सा प्रेम लेकर।

ये गलियां आज़ विकल
तुम्हारी बाट जोहतीं हैं अपलक
रात-रात भर जागतीं हैं
इन्हें सुलाने आ जाओ !

ये चिर-निद्रा-रत पेड़
यह धरती को दूधिया चांदनी से नहलाता चाँद
यह तारिकाओं की मद्धम चमक
यही तो था आलिंगनबद्ध होने का
सर्वथा उपयुक्त समय
ऐसे वक़्त में तुम भला
भटकन को लेकर कहाँ निकल गये ?

तुम सदियों भटक कर भी
नहीं प्राप्त कर सकोगे जोग
क्योंकि; तुम्हारे "भिक्षां देहि" के स्वर से
टपक पड़ेंगी अतीत की स्मृतियाँ
तुम्हारे भिक्षा-पात्र में उतर आएगा मेरा सौंदर्य
और तुम्हारी आँखों में मेरी चाहना
इससे तुम्हारा संन्यास मार्ग अवरुद्ध होगा।

प्रेम में पलायन निष्ठुरता है, नियति नहीं !

प्रेम को प्रतीक्षा की तलवार से काटा नहीं जा सकता
प्रेम को वासना की आग से जलाया नहीं जा सकता
प्रेम को आँसू सहला सकते हैं, आर्द्र नहीं कर सकते

ओ बावले जोगी !
एक बार तुम लौट आओ न
वासन्ती हवाओं में 
अब भी गीलापन शेष है।
पत्तों की सरसराहट में
मुझे अब भी तुम्हारे गीत सुनायी देते हैं।
यह चौपाल
तुम्हारी चहलकदमी चाहती है।
यह शीशम का पेड़
उकता जाता है।

मेरी पुकार इस पार से उस पार
आने में समय लगेगा, मैं जानती हूँ
तुम किसी अमावस की रात
बिना बताये निकल गये थे।

2.

ओ अलबेले जोगी !

चूड़ले की मजीठ फीटने से पहले आ जाना।
चूनरी की चमक को संभाल लेना आकर,
तुम इसकी मोती-माल बिखरने से पहले आ जाना।
इंगितों में बतियाने वाली मेरी चञ्चल आँखें
एक दिन पथरा जाएंगी
और ऑपरेशन में बींध कर रह जाएंगे
मोतिया के साथ ढेर सारे सपने
उस अभागे दिन से पहले आ जाना।
वक्ष की सन्धिरेखा अब तक ऋतुमती है
कहीं बाँझ न हो जाये, तुम आ जाना।

मेरी दायीं भुजा पर खुदा तुम्हारे नाम का टैटू
शिलालेख में बदल जाए, उससे पहले आ जाना।
मेरे हाथों की लकीरें मिट जाने से पहले तुम आ जाना।
पाँवों की थिरकन संगीत की बनिस्पत
इंजेक्शन का कहना माने, तुम आ जाना।

ओ मेरी नथनी के नक्षत्र !
ओ मेरे बाजूबंद से बावले साजन !
ओ मेरी मेहँदी की मनुहार !

तुम किसी और की राह न देखना
जहाँ हो, जैसे हो, बस चले आना
आना जरूर, क्योंकि तुम्हारा आना
मेरे जाने की क्रिया को आसान कर देगा !

3.

ओ अलबेले जोगी !

पंछी घोंसलों को लौट रहे हैं
सूर्य अस्ताचल को जा रहा है
पेड़-पौधे भी पत्तियों को आँचल में भर सोने जा रहे हैं
सब परिजनों के पास, अपनी चाहना के समीप
अपने-अपने भाग्य का सुख भोग रहे हैं
मैं और चकवी कैसी अभागिन हैं लेकिन
कि जिन्हें विरह से लिपट कर सोना है रात-भर !

यह रात भी कितनी निष्ठुर है
तिस् पर भी अमावस की रात
एक तो इसका बदरंग चेहरा चुभता है आँखों में
दूसरा, यह काटे नहीं कटती, इतनी लम्बी
यह रात नहीं कोई यात्रा है जिसे कि थके पाँव पूरा करना है।
दूर मन्दिर में बजतीं घण्टियों का क्वणन
तुम्हारे पांवों की आहट लगती है
मेरे बदन को स्पर्श करतीं सरसरी हवाएं
लगता है तुम्हारे आने का सन्देश दे रहीं हैं।

ओ मनमाने जोगी ! किंतु मैं अभागिन ठहरी
मेरी आँखों में प्रतीक्षा,
हाथ-पांवों में जड़ता,
मस्तिष्क में अधपकी कहानियां
और मेरी खटिया के पास पसरे सन्नाटे में
घुली हुई है विश्व की सम्पूर्ण पीड़ा !

तुम कभी जब लौट आओ तो
देखना इन रातों को
और तौलना मेरी पीर
मेरे प्रेम की थाह को इन अंधेरों से नापना
घण्टियों के स्वर में सुनना मेरा विरह-गीत
और जो ढूंढ सको तो ढूँढना
इन आती-जाती हवाओं में मेरी साँसों की घुटन !

◆ प्रवीण मकवाणा 

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