कविता
उधर
पीत अंशुक पहने
साँझ उतर रही थी पेड़ों पर धीरे-धीरे
इधर
मेरी आँखों में
पसर रही थी तुम्हारी प्रतीक्षा
गोधूलि में
पार दिखाई नहीं पड़ता था
लेकिन मैंने सुनी
पंछियों के कलरव में घुली हुई
तुम्हारी पदचाप
हवाओं के इंगितों में
तुम्हारे आगमन की सूचना थी
तुम्हारे स्वागत को उत्सुक थीं
घुमावदार पगडंडियां
निरभ्र आकाश में
तुम्हारी असंख्य छवियां थीं
हृदय आतुर था
और अँजुरियां उत्कंठित
मैं बैठा रहा रात भर
तुम्हारे आने की आश्वस्ति में
लेकिन तुम जाने कहाँ रह गयी थी ?
◆ प्रवीण मकवाणा
भाषा की प्रवीणता ने मोह लिया.....भावनाओ की उत्कृष्ट अनुभूति
ReplyDelete.....प्रकृति को जिस तरह जीवन का अंग बनाया है उससे सुमित्रानंदन पंत की याद आती है।
जल्द ही मिलने की कामना